इस ब्राह्मण नेता ने बीजेपी में मचाया हड़कंप, कड़े मुकाबले में दिग्गजों को दी करारी शिकस्त

भाजपा की हालिया रणनीति पर नजर दौड़ाएं तो सीतापुर शहर में पार्टी ने बिल्कुल नया चेहरा उतारा है।

By: आकांक्षा सिंह

Published: 10 Nov 2017, 08:55 AM IST

सीतापुर. जातिगत आंकड़ों के तहत यूपी के निकाय चुनावों में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में जुटी भारतीय जनता पार्टी ने सीतापुर शहर में आखिरकार ब्राम्हण प्रत्याशी को ही प्रत्याशी बनाया है। शहर में विधानसभा चुनाव में ओबीसी प्रत्याशी को मैदान में उतार कर जीत हासिल कर चुकी भाजपा अब सामान्य जाति के मतदाताओं पर डोरे डालने की तैयारी कर चुकी है जिसमें खासकर ब्राम्हण प्रत्याशी के जरिये ब्राम्हण मतदाताओं को प्रभावित करने का पैंतरा तैयार किया गया है। फिलहाल सीतापुर शहर में भाजपा ने ब्राम्हण प्रत्याशी घोषित किया है। खास बात यह है कि पार्टी ने इस रस्साकशी में कई दिग्गज ब्राम्हण नेताओं को हासिये पर ला दिया है।

मैदान में उतरा नया चेहरा

भाजपा की हालिया रणनीति पर नजर दौड़ाएं तो सीतापुर शहर में पार्टी ने बिल्कुल नया चेहरा उतारा है। यहां से ब्राम्हण जाति के राजेश शुक्ला को पार्टी ने नगरपालिका में खड़ा किया तो कई दिग्गज भाजपा नेताओं के पार्टी में अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े होने लगे। दरअसल सबसे पहले पार्टी में भाजपा के साकेत मिश्र का नाम सबसे ऊपर चला लेकिन हाई कमान से बातचीत के बाद साकेत ने अपना मन ही बदल लिया और नयी इबारत की तैयारी में जुट गए। साकेत के दौड़ से बाहर होने के बाद जिन जिन लोगों के बीच टक्कर रही उनमें आशीष मिश्र, राजेश शुक्ल, परीक्षित त्रिपाठी, गोविन्द भारती, अनुपम राठौर, मोनू सहगल खासकर भिड़ंत करते रहे। वहीं कुछ दिन पहले भाजपा सूत्रों ने जब शहर से ब्राम्हण प्रत्याशी के मैदान में उतारे जाने की बात स्पष्ट की तो लड़ाई में आशीष मिश्र, राजेश शुक्ल और परीक्षित त्रिपाठी के बीच काफी हद तक सिमट गयी। इन नेताओं की पृष्ठभूमि पर नजर दौड़ाएं तो आशीष मिश्र सीतापुर शहर में 2007 के पालिका चुनाव में चेयरमैन चुने गए थे और उन्होंने कद्दावर नेता राधेश्याम जायसवाल को हराया था। बसपा, कांग्रेस में अपनी राजनीति के कुछ कुछ दिन बिताने वाले आशीष इधर काफी वक्त से भाजपा में हैं लेकिन पिछले कार्यकाल में खुद की बनायीं गयी नकारात्मक छवि ने ही उनको इस बार पार्टी के फैसले में किनारे लगा दिया गया।

युवा भाजपा नेता अाजमाएंगे भाग्य

युवा भाजपा नेता परीक्षित त्रिपाठी की बात करें तो खुद को भाजपा या यूँ कहें कि सीतापुर की राजनीति में समायोजन करने की जद्दोजहद में जुटे परीक्षित जिनसे उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हीं के जरिये बैकफुट पर ढकेल दिए गए। सीतापुर से दो बार एमएलसी रहे भरत त्रिपाठी के पुत्र परीक्षित को पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए पिता के कद का फायदा तो मिला लेकिन पिता के भाजपा से सपा और फिर सपा से अन्द्रूहनी तौर पर भाजपा में आने की कोशिश ने उनके टिकट की मंशा पर प्रश्नवाचक लगा दिया। जाहिर है भाजपा के मौजूदा नेता और संगठन के पदाधिकारी भरत त्रिपाठी की राजनीति और उनके प्रदेश के पटल पर रहे चुके कद को बखूबी जानते हैं अलबत्ता कोई भी परीक्षित के नाम पर खुलकर पक्षधर नहीं बन सका और वह टिकट की रेस से बाहर हो गए।

 

वहीं टिकट की इस रेस में भाजपा की कसौटी पर खरे उतरे राजेश शुक्ल ने लगभग 15 वर्ष पूर्व सीतापुर के एक मोहल्ले से सभासदी का चुनाव जीता था। जिसके बाद लखनऊ में प्रॉपर्टी के व्यापार में करोड़ो कमा चुके राजेश अचानक कैसे दिग्गजों को पछाड़ कर सीतापुर शहर के प्रथम नागरिक बनने की दौड़ में भाजपा के मंझे हुए नेता बन गए इसके पीछे भी कई तर्क हैं जो चर्चाओं में आ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि राजेश के सीधे रिश्ते मौजूदा भाजपा अध्यक्ष महेंद्र पांडेय से हैं और टिकट की रेस जीतने में राजेश इसी रिश्ते के कृपापात्र बने हैं।

तीन ब्राम्हण प्रत्याशी उतरे मैदान में

जातिगत आंकड़ों के तहत यूपी के निकाय चुनावों में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में जुटी भारतीय जनता पार्टी ने सीतापुर शहर में आखिरकार ब्राम्हण प्रत्याशी को ही प्रत्याशी बनाया है। शहर में विधानसभा चुनाव में ओबीसी प्रत्याशी को मैदान में उतार कर जीत हासिल कर चुकी भाजपा अब सामान्य जाति के मतदाताओं पर डोरे डालने की तैयारी कर चुकी है जिसमें खासकर ब्राम्हण प्रत्याशी के जरिये ब्राम्हण मतदाताओं को प्रभावित करने का पैंतरा तैयार किया गया है। फिलहाल सीतापुर शहर में भाजपा ने ब्राम्हण प्रत्याशी घोषित किया है। खास बात यह है कि पार्टी ने इस रस्साकशी में कई दिग्गज ब्राम्हण नेताओं को हासिये पर ला दिया है।

 

भाजपा की हालिया रणनीति पर नजर दौड़ाएं तो सीतापुर शहर में पार्टी ने बिल्कुल नया चेहरा उतारा है। यहां से ब्राम्हण जाति के राजेश शुक्ला को पार्टी ने नगरपालिका में खड़ा किया तो कई दिग्गज भाजपा नेताओं के पार्टी में अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े होने लगे। दरअसल सबसे पहले पार्टी में भाजपा के साकेत मिश्र का नाम सबसे ऊपर चला लेकिन हाई कमान से बातचीत के बाद साकेत ने अपना मन ही बदल लिया और नयी इबारत की तैयारी में जुट गए। साकेत के दौड़ से बाहर होने के बाद जिन जिन लोगों के बीच टक्कर रही उनमें आशीष मिश्र, राजेश शुक्ल, परीक्षित त्रिपाठी, गोविन्द भारती, अनुपम राठौर, मोनू सहगल खासकर भिड़ंत करते रहे। वहीं कुछ दिन पहले भाजपा सूत्रों ने जब शहर से ब्राम्हण प्रत्याशी के मैदान में उतारे जाने की बात स्पष्ट की तो लड़ाई में आशीष मिश्र, राजेश शुक्ल और परीक्षित त्रिपाठी के बीच काफी हद तक सिमट गयी। इन नेताओं की पृष्ठभूमि पर नजर दौड़ाएं तो आशीष मिश्र सीतापुर शहर में 2007 के पालिका चुनाव में चेयरमैन चुने गए थे और उन्होंने कद्दावर नेता राधेश्याम जायसवाल को हराया था। बसपा, कांग्रेस में अपनी राजनीति के कुछ कुछ दिन बिताने वाले आशीष इधर काफी वक्त से भाजपा में हैं लेकिन पिछले कार्यकाल में खुद की बनायीं गयी नकारात्मक छवि ने ही उनको इस बार पार्टी के फैसले में किनारे लगा दिया गया।

युवा भाजपा नेता परीक्षित त्रिपाठी की बात करें तो खुद को भाजपा या यूँ कहें कि सीतापुर की राजनीति में समायोजन करने की जद्दोजहद में जुटे परीक्षित जिनसे उम्मीद लगाए बैठे थे उन्ही के जरिये बैकफुट पर ढकेल दिए गए। सीतापुर से दो बार एमएलसी रहे भरत त्रिपाठी के पुत्र परीक्षित को पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए पिता के कद का फायदा तो मिला लेकिन पिता के भाजपा से सपा और फिर सपा से अन्द्रूहनी तौर पर भाजपा में आने की कोशिश ने उनके टिकट की मंशा पर प्रश्नवाचक लगा दिया। जाहिर है भाजपा के मौजूदा नेता और संगठन के पदाधिकारी भरत त्रिपाठी की राजनीति और उनके प्रदेश के पटल पर रहे चुके कद को बखूबी जानते हैं अलबत्ता कोई भी परीक्षित के नाम पर खुलकर पक्षधर नहीं बन सका और वह टिकट की रेस से बाहर हो गए।

 

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Bhartiya janta party, IMAGE CREDIT: Bhartiya janta party,

वहीं टिकट की इस रेस में भाजपा की कसौटी पर खरे उतरे राजेश शुक्ल ने लगभग 15 वर्ष पूर्व सीतापुर के एक मोहल्ले से सभासदी का चुनाव जीता था। जिसके बाद लखनऊ में प्रॉपर्टी के व्यापार में करोड़ो कमा चुके राजेश अचानक कैसे दिग्गजों को पछाड़ कर सीतापुर शहर के प्रथम नागरिक बनने की दौड़ में भाजपा के मंझे हुए नेता बन गए इसके पीछे भी कई तर्क हैं जो चर्चाओं में आ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि राजेश के सीधे रिश्ते मौजूदा भाजपा अध्यक्ष महेंद्र पांडेय से हैं और टिकट की रेस जीतने में राजेश इसी रिश्ते के कृपापात्र बने हैं।

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