दीयों के त्यौहार से पहले कुम्हारों ने सुनायीं अपनी दास्ताँ, अब नहीं देखी जाती उनकी कारीगरी

दीयों के त्यौहार से पहले कुम्हारों ने सुनायीं अपनी दास्ताँ, अब नहीं देखी जाती उनकी कारीगरी
Diwali 2017

Shatrudhan Gupta | Updated: 13 Oct 2017, 10:51:53 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

दियो की जगह अब आर्टिफिसियल लाइटों ने ले ली हैं जो अब बड़ी तादाद में बाजार में उपलब्ध हैं।

सीतापुर. दीयों के त्यौहार दिपावली में एक ज़माने से कुम्हारों की कारीगरी की बोली लगती आ रही है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में विदेशी चमक ने इनकी कारीगरी को फीकी सी कर दिया है। जी हां, दीयों की जगह अब आर्टिफिसियल लाइटों ने ले ली हैं, जो अब बड़ी तादाद में बाजार में उपलब्ध हैं।

दरअसल, बाजारों में इन लाइटों ने दीपावली में बिकने वाले दीयों की जगह इसलिए भी जल्दी ले ली, क्योंकि लाइटों के व्यापार में एक बड़ा व्यापारिक तबका हावी हो गया और महज कुछ दिनों के अंतराल में ही लाखों करोड़ों का वारा न्यारा किया जाने लगा। ग्रामीण इलाकों में कुंभारो की कुम्भार गिरी धरातल पर है और वह अब गांवों से शहर की ओर पलायन करने पर विवश है। ऐसे में न तो उनको कोई सरकार से प्रोत्साहन मिल रहा है ना ही थोड़े सी कारीगरी उनको उनकी लागत दिला पा रही है।

सीतापुर के पिसावां ब्लाक के फरीदपुर गाव निवासी किशोरी लाल प्रजापति ने बताया की उनके पूर्वजों द्वारा डाली गई मिट्टी के बर्तन बनाने की नीव का व्यापार बीते 40 साल से आज भी चल आ रहा है, लेकिन आज के वक्त में मुश्किल यह हैं कि जितनी लागत लगती है, उतना भी पैसा वापस आना मुश्किल पड़ जाता है। दीवाली व शादी कामकाजो में मिट्टी की जगह स्टील के बर्तन अधिकांश इस्तेमाल किये जाने लगे है, जिस कारण हम लोग अपने पैतृक कार्य को बंद करने की कगार पर आ गए।

लागत व मेहनत लगती है ज़्यादा, मुनाफा है बहुत कम

कारीगर किशोरी लाल ने बताया कि एक सैकड़ा दीपक बनाने में करीब दो से ढाई घंटे लगते है और उनको पकाने में एक रात लग जाती है, जिसमे कोयला या फिर गोबर के उपले लगाने पड़ते हैं। जिसमे लागत अधिक आती वहीं माल कम निकलता है और बर्तनों में सफाई भी उतना नही आती है। जितना प्लास्टिक के बर्तनों में आती है तो इसलिए मिट्टी के कार्य मे अब वो मुनाफ़ा नही रहा, महज एक नाम रह गया है।

पूर्व सरकार में प्रजापति समाज के मंत्री ने दिए थे चाक

पूर्व सपा सरकार में कच्चे मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए प्रजापति समाज के मंत्री रहे गायत्री प्रसाद प्रजापति ने जिले के मिश्रिख ब्लाक में आधुनिक चाक वितरित कराया था, लेकिन अब हम लोगो की सुनने वाला कोई नही है।

आर्टीफीसियल की तुलना में महंगे पड रहे दीपक

मौजूदा समय मे इलेक्ट्रॉनिक लाईट सस्ती पड़ रही है, दीपक लाइट के अपेक्षा महंगे पड़ रहे है तो ग्राहक दीपक की जगह इलेक्ट्रिक लाइट का ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे है। एक दीपक को जलने में कम से पांच रुपये का खर्च आता है। तो वही विद्युत जनित झालरें काफी सस्ती व शोवर मिलती है।

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