होली की पूर्व संध्या पर दिखा दिवाली जैसा मनोहारी नजारा, सीतापुर के मिश्रिख तीर्थ की ये है खासियत

होली की पूर्व संध्या पर दिखा दिवाली जैसा मनोहारी नजारा, सीतापुर के मिश्रिख तीर्थ की ये है खासियत

सीतापुर. वक़्त होली के रंगों में सराबोर हो जाने का और माहौल एक दूजे को गुलाल से रंगने का है। रंगों की रंगीनी में मस्त हो जाने का क्यूंकि यह रंगों व उमंगो का त्यौहार है। लेकिन ऐसे रंगों के माहौल में हम आपसे आतिशबाज़ी की बात करने लगे तो आप को शायद बहुत ही अजीब लगेगा। लेकिन ज़्यादा हैरान होने की जरुरत नहीं है क्यूंकि सीतापुर के मिश्रिख तीर्थ में होलिका दहन के ठीक पहले जमकर आतिशबाजी की जाती है। जी हाँ बिलकुल ऐसा ही है अगर आप को मालूम न हो और आप एकाएक यह मंज़र देख ले तो कुछ देर के लिए आप अचरज में जरुर पड़ जायेगे कि यह होली का मौका है या फिर रोशनी का त्यौहार मनाने जाने वाले दीपावली का। क्यूंकि आसमानी पटाखों की गड़गड़ाहट आपको ऐसा ही सोचने पर मजबूर कर देगी। यहाँ पर प्रतिवर्ष होली की शुरुआत रंगों से नहीं बल्कि पटाखों के साथ होती है जिसमे लाखो की संख्या में सुदूर इलाको से आये श्रद्धालु इस मनोहारी द्रश्य का गवाह बनते है।


तीर्थ पर होली से पहले दीवाली से होता नजारा

पौराणिक कथाओ के अनुसार देवासुर संग्राम के वक़्त राक्षसों के संहार के लिए अपनी अस्थिया दान करने वाले महर्षि दधीची की तपोस्थली मिश्रिख स्थित दधीची कुंड पर होली से ठीक पूर्व होने वाले एक पखवारे के होली मेले का अपना अलग महत्त्व होता है। इस तीर्थ के इर्द गिर्द इन 15 दिनों के दौरान होने वाली चौरासी कोस व पंचकोसी परिक्रमाओ के बाद मिश्रिख पहुंचने वाले लाखो तीर्थ यात्री प्रतिवर्ष यहाँ के होली मेला में डेरा डालते है। जिसका समापन होलिकादहन से पूर्व घंटो चलने वाली आतिशबाजी के साथ होता है। आतिशबाज़ी भी कोई मामूली नही बल्कि ऐसी की बस देखते ही रह जाओ। दधीची कुंड पर होने वाली इस आतिशबाजी के पूर्व लाखो लोगो की मौजूदगी में पहले तीर्थ की आरती के साथ पूजन किया जाता है इसके बाद जितने भी परिक्रमार्थी आते है सब आतिशबाजी के इस कार्यक्रम को देखते है। जिला प्रशासन के आलाधिकारी भी इस पूरे कार्यक्रम में हमेशा मौजूद रहते है।

परिक्रमा के समापन पर होता आयोजन

मिश्रिख में वर्षो से होता आ रहा यह आयोजन उन परिक्रमार्थियो के सम्मान में किया जाता है जो चौरासी कोसीय व पंचकोसीय परिक्रमा को करने के बाद उनके समापन पर तीर्थ में स्नान करने आते है। 15 दिनों तक पैदल 84 कोस की परिक्रमा करने के बाद तीर्थ यात्री यहाँ से इस समापन के बाद अपने अपने घरो को वर्ष भर की खुशहाली का सपना लेकर इस प्रतिज्ञा के साथ वापस होते है कि मिश्रिख तीर्थ में अगले वर्ष आने का उनका कार्यक्रम फिर बने और वे पुण्य के भागीदार बने।

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नितिन श्रीवास्तव Desk/Reporting
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