325 साल से श्मशान में विराजित है भूतेश्वर महादेव


जोधपुर शिवालय दर्शन-2

By: Nandkishor Sharma

Published: 21 Jul 2020, 11:29 PM IST

स्‍पेशल

नंदकिशोर सारस्वत

जोधपुर. भूतेश्वर वन क्षेत्र की पहाडिय़ों में स्थित सिवांचीगेट श्मशान में 325 साल से भूतेश्वर महादेव विराजित हैं। शहर के बीच वन खंड में सिवांचीगेट श्मशान भूमि के आगे पहाडिय़ों के मध्य श्मशान की बांयी ओर जबरेश्वर महादेव स्थित हैं। इससे आगे भूतनाथ मंदिर हैं। वास्तव में इसके ईर्द- गिर्द अटक भैरु, अजनेश्वर आश्रम, जागनाथ, पंथेश्वर आदि कई शिवालय हैं। जबरनाथ से आगे भूतनाथ मंदिर की सीमा के बांयी ओर एक विशाल बगीचा है जिसमें बिल्वपत्र, शहतूत, अडूसा, आम के पेड़ों के साथ हरितिमा फैली हुई हैं। बगीचे के मध्य फव्वारा बगीचे की छठा को और भी निखारता हैं। भूतेश्वर मंदिर में प्रवेश करते ही दांयी ओर मुख्य मंदिर है जिसमें सरस्वती, राधाकृष्ण, उष्ट्रवाहिनी, गणेश, हनुमान आदि देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। पारम्परिक रूप से यह मान्यता रही है कि इस क्षेत्र में विक्रम संवत 1750 में बोहरा पुष्करणा ब्राह्मण हरदत्त को पहाड़ों में जड़ी बूटी संग्रह करते समय प्राकृतिक रूप से शिवलिंग के दर्शन हुए । वैसे यह समूचा क्षेत्र जंगली सुअरों का विचरण क्षेत्र माना जाता था।

विधि सम्मत है महामृत्युंजय मूर्ति
वर्तमान में मंदिर के बीच खुले चौगान से चंद कदमों की दूरी पर दक्षिणामुखी महामृत्युंजय मूर्ति स्थापित है। महामृत्युंजय की मूर्ति दोनों ओर शास्त्रीय नियमानुसार पहाड़ तथा वट वृक्ष, बिल्व पत्र के पेड़ आच्छादित हैं। मूर्ति को पूरे विधि विधान से स्थापित किया गया हैं। कमल पर आसीन महामृत्युंजय की मूर्ति के पहले महामृत्युंजय मंत्र शिला पट्ट पर अंकित हैं। मुख्य मंदिर गर्भगृह के अतिरिक्त दांयी ओर दो कक्ष में शिव पार्वती, गणेश और नंदी की मूर्तियां स्थापित हैं।

अगस्तय ऋषि व कुबेर भी
मुख्य मंदिर के पास ही अगस्तय ऋषि की मूर्ति स्थापित हैं। मूर्ति को राना के चेयरमैन प्रेम भंडारी ने स्थापित करवाया था। कहा जाता है कि मित्रबाहु के पुत्र अगस्तय ऋषि थे। दक्षिण के तमिल साहित्य में अगस्तय ऋषि का प्रमुख स्थान हैं। मंदिर पूजन व्यवस्था में बोहरों के पोल के सभी बोहरा परिवार के सदस्य सहयोग करते हैं। मंदिर कुबेर की प्रतिमा हैं।

कोरोना के कारण भक्तो का प्रवेश बंद

भूतनाथ मंदिर के में निर्मित जलकुंड की दांयी ओर पहाड़ी के ऊपर से कृत्रिम रूप से एक झरने का निर्माण किया गया हैं। झरने के ठीक मध्य में गोमुख से बहता पानी मनोहारी छठा उत्पन्न करता हैं। श्रावण मास के सोमवार को मंदिर में मेले सा माहौल होता हैं। लेकिन इस बार कोरोना महामारी के कारण मंदिर में भक्तों का प्रवेश बंद है ।

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