जानें एक साल में पडऩे वाले 4 नवरात्रों का रहस्य, महत्व और फल

देवी पुराण के अनुसार सनातन संस्कृति में चैत्र प्रतिपदा से प्रत्येक तीन-तीन माह में होते हैं नवरात्र

By: abhishek dixit

Published: 04 Apr 2019, 08:08 AM IST

जबलपुर. हिन्दू संस्कृति में नववर्ष का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। देवी पुराण के अनुसार सनातन संस्कृति में चैत्र प्रतिपदा से प्रत्येक तीन-तीन माह के पश्चात नवरात्रि का आगमन होता है। जिसमें चैत्र और अश्विन नवरात्र प्रकट नवरात्र के रूप में तथा आषाढ़ और माघ (पौष) नवरात्र गुप्त नवरात्र के रूप में मनाई जाती है। चैत्र नवरात्र को वासंतेय नवरात्र भी कहा जाता है और अश्विन (कार्तिक) नवरात्र का शारदेय नवरात्र कहा जाता है। सामान्यत: इन दो प्रकट नवरात्रों की जानकारी सभी को होती है, परंतु जैसे नाम- गुप्त नवरात्र (आषाढ़ और पौष) इसकी जानकारी अधिकांश लोगों को नहीं होती।

विभिन्न पुराणों में चैत्र प्रतिपदा को लेकर अलग-अलग तथ्य स्पष्ट किये हैं। जो नववर्ष के लिए प्रमाण के रूप में सर्व सम्मत हैं:-
- चैत्र प्रतिपदा के दिन भगवान ब्रम्हा ने सृष्टि की संरचना प्रारंभ की।
- चैत्र प्रतिपदा के दिन भगवान विष्णु ने अपना प्रथम अवतार (मत्स्य अवतार) लिया।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही भगवान विष्णु के तीसरे अवतार (वाराह अवतार) ने समुद्र के अंदर दैत्य हिरण्याक्ष से युद्ध करके उसका वध करके पृथ्वी को समुद्र के बाहर स्थापित किया था। चैत्र प्रतिपदा के दिन घर-द्वार स्वच्छ करके रंगोली और अल्पना से सजाए जाते हैं, मुख्य द्वार पर आम के बंदनवार बांधे जाते हैं। मराठी संस्कृति में घर के खुले स्थान पर गुढ़ी फहराई जाती है, जो विजय ध्वजा या विजय पताका के रूप में होती है। जिसे पीढ़े (पाटे) पर गुढ़ी को आसन दिया जाता है, वह जीवन में स्थिरता का प्रतीक होता है, पूजन की थाली में सुपाड़ी संकल्प और हल्दी कुमकुम सौभाग्य का प्रतीक होता है। जिस डंडिका या काढ़ी में गुढ़ी बांधी जाती है वह जीवन में सामथ्र्थता लाती है और उसकी ऊंचाई कीर्ति की वृद्धि प्रसारित करती है।

गुढ़ी में बांधे जाने वाला वस्त्र वैभव का, आम के पत्ते - शुभता का, नीम के पत्ते - आरोग्यता का, शक्कर की माला - जीवन में माधुर्यता का, फूलों का हार-मंगल का और कलश यश, समृद्धि का प्रतीक होता है। यदि चैत्र प्रतिपदा के वैज्ञानिक आधार पर विचार करें तो हम पाएंगे इस दिन नीम के कोमल पत्तों को मिश्री और काली मिर्च के साथ पीस कर खाने से वर्ष भर शरीर निरोग रहता है। यदि इन चारों नवरात्रों में फलाहार के साथ उपवास किया जाए तो इस प्रक्रिया से शरीर का परिमार्जन होता है, और व्यक्ति दीर्घ आयु तथा स्वस्थ्य जीवन का स्वामी होता है।
- डॉ. नुुपूर निखिल देशकर, सहायक प्राध्यापक

abhishek dixit
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned