
कनवेलिसेंट प्लाज्मा थैरेपी के लिए प्लाज्मा दान करता कोरोना से ठीक हुआ मरीज
उनका कहना है कि कनवेलिसेंट प्लाज्मा थैरेपी के जरिए रोगी के शरीर में बाहरी एंटीबॉडी दिए जाते है जिससे बॉडी में वायरस का लोड कम होता है और धीरे—धीरे मरीज संक्रमण से बाहर आने लगता है। हालांकि अमेरिकन फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) सहित भारतीय आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) ने अभी तक इस थैरेपी पर अंतिम मुहर नहीं लगाई है लेकिन दुनिया भर में इस थैरेपी का उपयोग उन इक्का—दुक्का मरीजों पर किया जा रहा है जो कोरोना संक्रमण के अंतिम स्टेज पर जा पहुंचे हैं।
क्या होता है कनवेलिसेंट प्लाज्मा
डा. अजीत जैन का कहना है कि कनवेलिसेंट प्लाज्मा उन मरीजों से लिया जाता है जो कोरोना वायरस संक्रमण की चपेट में आने के बाद ठीक होकर घर आ चुके हैं। चूंकि ये स्थापित सिद्धांत है कि संक्रमण से लड़ने के लिए मानव शरीर में एंटीबॉडी बनाती है। ये एंटीबॉडी ब्लड के प्लाज्मा में रहते हैं और वह प्लाज्मा ही कनवेलिसेंट प्लाज्मा कहलाता है। इस एंटीबॉडीयुक्त प्लाज्मा को ब्लड सेपरेटर मशीन के जरिए अलग करके आठ घंटे के अंदर फ्रोजन कर माइनस 18 डिग्री के तापमान पर स्टोर कर दिया जाता है। इस प्लाज्मा को एक साल तक काम लिया जा सकता है।
पहले भी मिल चुके हैं बेहतर परिणाम
एक सवाल के जवाब में डा. अजीत जैन ने बताया कि कनवेलिसेंट प्लाज्मा थैरेपी पर सवाल उठाने वाले यह जान लें कि यह थैरेपी 2003 के सार्स संक्रमण, 2009—10 के स्वाइन फ्लू (एच1एन1) और 2012 के मार्स (मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस) संक्रमण के समय आजमायी गई थी और इसके बेहतर परिणाम मिले थे। इसका इस्तेमाल करने के लिए जारी गाइड में निर्देश दिए गए हैं कि जिन मरीजों को टेस्ट में कोराना संक्रमण की पुष्टि होने के साथ ही उसकी जान जाने का खतरा हो तो यह थैरेपी देकर उसकी जान बचाने के प्रयास किए जा सकते हैं। डा. अजीत का दावा है कि अभी इस थैरेपी का क्लिनिकल ट्रॉयल चल रहा है। उनके इस दावे की पुष्टि स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने यह कहते हुए की है कि प्लाज़्मा थेरेपी अभी एक्सपेरिमेंटल स्टेज में है।
इन मरीजों को दी जाती है कनवेलिसेंट प्लाज्मा थैरेपी
प्रख्यात कार्डियक थोरासिक सर्जन डा. अजीत जैन का कहना है कि कोरोना संक्रमण से ठीक हुए मरीज के शरीर से एंटीबॉडी उसके ठीक होने के दो हफ्ते बाद ही लिए जा सकते हैं और उस रोगी का दो बार टेस्ट किया जाना चाहिए। उसका एलिज़ा (एन्ज़ाइम लिन्क्ड इम्युनोसॉर्बेन्ट ऐसे) टेस्ट करके शरीर में एंटीबॉडी की मात्रा का पता भी लगाया जाता है। प्लाज़्मा थेरेपी उन मरीज़ों को दी जाती है जो आईसीयू में होते हैं। जहां उनकी स्थिति को सोफा स्कोर यानी सिक्वेंशियल ऑर्गन फेलियर असेसमेंट स्कोर के आधार पर देखा जाता है। थेरेपी देने के बाद देखा जाता है कि इस स्कोर में क्या सुधार हुआ। साथ ही मरीज़ के वायरल लोड यानी उसके अंदर के वायरस में थेरेपी के बाद कितना फ़र्क़ है और क्या इसके बाद वेंटिलेटर की सेटिंग चेंज हुई या नहीं।
एफडीए की ये है गाइडलाइन
डा. अजीत जैन के अनुसार कोरोना के मरीजों को कनवेलिसेंट प्लाज्मा थैरेपी देने के लिए एफडीए ने एक गाइड लाइन तैयार कर रिकमंडेशन दी हैं। जिसके तहत ऐसे मरीज जो मरणासन्न हो चुके हैं लेकिन उन्हें बचाने के प्रयास किए जा सकते हैं, ऐसे मरीज जो मरणासन्न होने की अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं और मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग सहित अन्य गम्भीर रोगों से ग्रस्त हाईरिस्क पेशेंट पर इस थैरेपी का ट्रायल किया जा सकता है। डा. जैन ने बताया कि इस थैरेपी को एफडीए ने एप्रूव नहीं किया है लेकिन ट्रॉयल पर रोक भी नहीं लगाई है।
Published on:
02 May 2020 08:10 pm
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