रोज 52 मिनट और महीने में 1560 घंटे हम गॉसिप करने में बिताते हैं हम

-एक अध्ययन में समाजशास्त्रियों ने पाया कि गॉसिपऐसा विषय है जिसमें हर कोई न चाहते हुए भी शामिल हो जाता है

By: Mohmad Imran

Published: 16 May 2020, 11:39 AM IST

पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को गॉसिप करना पसंद है। लेकिन हाल के एक शोध की मानें तो गॉसिप की आदत पर किसी को भी शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बेहद स्वाभाविक और आदिम अनुवांशिक गुण है जो हमें हमारे पूर्वज आदिमानव से मिला है। सोशल साइंटिस्ट्स ने एक अध्ययन में पाया कि अगर आसपास गपशप और चुगली चल रही हो तो किसी के लिए भी इसे सुने बिना रह पाना मुश्किल होता है। लाख कोशिशों के बावजूद इंसान ऐसी चुगली या गॉसिप में शामिल हो ही जाता है, क्योंकि यह हमारे क्रमिक विकास के दौरान जन्मी एक अनुवांशिक प्रवृत्ति है जो अब मानव स्वभाव बन गई है। इलिनोइस के गेलसबर्ग के नॉक्स कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर और प्रमुख शोधकर्ता फ्रैंक मैकएंड्र्यू का कहना है कि प्रगैतिहासिक काल में भी आदिमानव ऐसा करते थे और जो लोग अन्य आदिमानवों के जीवन से मोहित थे वे अप्रत्याशित रूप से ज्यादा सफल भी थे।

रोज 52 मिनट और महीने में 1560 घंटे हम गॉसिप करने में बिताते हैं हम

रोज 52 मिनट गॉसिप में बीतते
मानव व्यवहार और गॉसिप के विशेषज्ञ फ्रैंक ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया रिवरसाइड के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अन्य शोध के हवाले से बताया कि एक सामान्य व्यक्ति जाने-अनजाने औसतन लगभग 52 मिनट प्रतिदिन गॉसिपिंग करने में ही बिता देता है। यानि महीने में करीब 1560 घंटे हम गॉसिप करने के अलावा कुछ नहीं करते। हालांकि केवल 15 फीसदी गॉसिप ही नकारात्मकता का कारण बनती है, लेकिन इससे हम में सामाजिक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण बहुत-सी जरूरी बातों की समझ भी विकसित होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया रिवरसाइड की शोधकर्ता प्रोफेसर मेगन रॉबिंस का कहना है कि गॉसिप दरअसल मानव बातचीत का आधार है। यह संबंधों को मजबूत करने में भी मदद करती है।

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