दर्द के सैलाब में डूबे परिवार को चाहिए कोई तारणहार

Chand Mohammed Shekh

Updated: 23 Sep 2019, 03:27:17 PM (IST)

स्‍पेशल

औलाद के दर्द का गम क्या होता है जानना चाहते हैं आप? तो थोड़ा वक्त निकालिए और चले आइए जयपुर शहर के मोहल्ला सिलावटान में रहने वाले युवा दंपति वाहिद बेग और मुजफ्फर जहां के यहां। इनके घर में डेरा डाले दर्द को जानकर रूह कांप जाएगी आपकी। पिछले पांच साल से गम के सैलाब में डूबे इस परिवार को किसी तारणहार की सख्त जरूरत है।

बेग दंपति के तीनों नौजवान बच्चों की किडनियां खराब हैं। दो की किडनी ट्रांसप्लांट हो चुकी हैं और अब तीसरे बेटे को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत है। दो वक्त के खाने के लिए जूझ रहे परिवार के पास इतने पैसे नहीं है कि इस तीसरे बच्चे की किडनी ट्रांसप्लांट करा सके और इन बच्चों की दवा पर महीने बीस हजार रुपए खर्च कर सके।
पैंतालीस वर्षीय वाहिद बेग के 18 वर्षीय बेटे फरजान का पिछले चार साल से किडनी का इलाज चल रहा है। पिछले छह माह से सप्ताह में दो बार डायलिसिस हो रहा है। फरजान का दर्द उसकी चाची अनीसा बेगम से देखा गया नहीं गया और उसने तय किया कि वह फरजान को अपना गुर्दा देगी। लेकिन मामला अटका है गुर्दारोपण पर होने वाले खर्च पर जो लगभग पांच लाख रुपए है। नियती का अजीब खेल देखिए कि घर के इन पांच सदस्यों के पास अभी मात्र चार किडनियां हैं।

बेग परिवार के बुरे दिनों की शुरुआत 2014 में हो गई, जब जांच कराने पर अचानक इनको पता चला कि उनके 22 वर्षीय बेटे शाहरूख की दोनों किडनियां खराब हैं। इनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। मां ने बेटे को किडनी दी और रिश्तेदारों ने किडनी ट्रांसप्लांट के लिए आठ लाख रुपए जुटाकर इनको दिए।

बेग दंपति इस दुख से उबरे भी नहीं थे कि फिर से उन पर गम का पहाड़ टूट पड़ा। बेटे की किडनी ट्रांसप्लांट के दो माह बाद ही पता चला कि उनकी बेटी आफरीन के भी दोनों गुर्दे खराब हैं। जैसे-तैसे रिश्तेदारों आदि से पांच लाख रुपए जुटाकर इन्होंने किडनी ट्रांसप्लांट कराई। इस बार पिता ने बेटी को किडनी दी। छह माह के अंतराल में दोनों की किडनी ट्रांसप्लांट हुई।

दोनों बच्चों के पहाड़ से दुख को झेल रहे इन माता ने एहतियातन अपने तीसरे बेटे फरजान की जांच कराई तो फिर उनके होश फाख्ता हो गए। तीसरे बच्चे की किडनी में भी गड़बड़ निकली। वे पिछले चार साल से अपने तीसरे बेटे फरजान के गुर्दों का इलाज करवा रहे हैं। अब किडनी ट्रांसप्लांट करवाई जानी है लेकिन हालात है कि इसकी इजाजत ही नहीं दे रहे हैं। बड़े बेटे और बेटी के इलाज में हर महीने दवा के रूप में बीस हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। नगीनों का काम कर अपना गुजारा करने वाले वाहिद बेग के लिए ये बहुत बड़ी चुनौती है। अब तो काम के लिए भी वक्त नहीं है।

पिछले पांच सालों से बच्चों के इलाज में ही रात दिन एक किए हुए हैं। इन्होंने मदद के लिए कई जगह हाथ फैलाए लेकिन इन्हें सिवाय मायूसी के कुछ हाथ नहीं लगा। इतनी पीड़ा के बाद भी इस दंपति का हौसला और संघर्ष बेमिसाल है और वे पूरी कोशिश में लगे हैं अपने जिगर के टुकड़ों की स्वस्थ जिंदगी के लिए।

इन तीनों बच्चों का इलाज मेरी देखरेख मे ही चल रहा है। इस तरह के मामले बहुत ही कम देखे गए हैं। इस बीमारी का कारण आनुवांशिक हो सकता है। बच्चे का किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी हैै।
डॉ. आलोक जैन, वरिष्ठ गुर्दा रोग विशेषज्ञ, जयपुर

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