अपना सारा सच लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है : गोविंद मिश्र

Navyavesh Navrahi

Publish: Oct, 13 2017 06:40:02 (IST)

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अपना सारा सच लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है : गोविंद मिश्र

समकालीन कथा साहित्य में गोविंद मिश्र की अलग पहचान है। उनके बारहवें उपन्यास ‘शाम की झिलमिल’ के विमोचन के अवसर पर सीआर रैगर ने उनसे बातचीत की...

आपके जीवन की ऐसी कोई वजह जिससे आप लेखन की ओर प्रवृत्त हुए?

मैंने किशोरावस्था में जब पहली कहानी लिखी तब यह ख्याल भी नहीं था कि मुझे लेखक बनना है। पहली कहानी ‘पूर्णमासी का भोग’ चौदह वर्ष की उम्र में लिखी थी। वह मेरी जो बाल्यावस्था की प्रेमिका थी, उसके लिए लिखी गई थी। लेखक बनने का आकर्षण शायद बीए में हुआ। लेखकों के प्रति पहला आकर्षण यह था कि वे कितना दूर तक सोचते हैं। दूसरा वह माहौल साहित्यमय था।

प्रशासनिक पद पर रहते हुए भी आपका साहित्य के प्रति गहरा अनुराग रहा। कैसे संभव हुआ यह ?

इसलिए कि मेरे जीवन की वरीयताओं में लिखना प्रथम रहा। अभी भी न मुझे बोलने में वो संतोष मिलता है, न पुरस्कार पाने में जो लिखने में मिलता है। शुरुआत में ही तय था कि गंभीर ही लिखूंगा।

प्रत्येक साहित्यकार अपनी रचनाओं में अपने आप को उड़ेलता है। आप क्या आत्मकथा लिखने की भी सोचते हैं?

मेरा ज्यादातर लेखन, सारा तो नहीं, आत्मकथात्मक है। उसमें मेरे अनुभव हैं इसलिए मुझे अलग से आत्मकथा लिखने की जरूरत नहीं महसूस होती। यह भी सही है कि अपना सारा सच लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है। ‘लाल पीली जमीन’, ‘उतरती हुई धूप’, ‘वह/अपना चेहरा’, ‘कोहरे में कैद रंग’ और जो अभी लिखा है ‘शाम की झिलमिल’- ये काफी आत्मकथात्मक हैं।

अपनी पीढ़ी की महिला कथाकारों में किसका लेखन आपको पसंद है?

यह व्यक्तिगत रुचि का सवाल है। फिर भी अपनी सीनियर्स मेें उषा प्रियंवदा और कृष्णा सोबती की कहानियां। आज की महिला लेखिकाओं में राजी सेठ हैं। एकदम नए कथाकारों में जयश्री राय - उनकी भाषा बड़ी ही संवेदनात्मक है।

वैयक्तिक पे्रम ने आपके साहित्य सृजन को कितना और कैसे प्रभावित किया है?

देखिए! प्रेम बुनियादी चीज है। वह निजी होकर भी निज तक सीमित नहीं रहता। आप उसके बाद हर व्यक्ति से पे्रम करने लगते हैं। एक लेखक के लिए यह बहुत जरूरी चीज है- दूसरों के दुख में हिस्सेदारी करना; दूसरे की भावनाएं जानने की कोशिश करना। प्रेम यह हिस्सेदारी सिखाता है।

‘पांच आंगनों वाला घर’ उपन्यास के आधार पर आजादी से पहले व उसके बाद बदलते भारतीय समाज के बारे में आपका क्या दृष्टिकोण है?

इस उपन्यास में तीन पीढिय़ों का चित्रण है। वह स्वतंत्रता के ठीक पहले शुरू होता है जब 1942 में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू हुआ था और वहां से 1990 तक यानी इमरजेंसी को क्रॉस करते हुए। तीन पीढिय़ों में जो बाहर समाज में घट रहा था- चाहे वह अंगे्रजों को हटाने की बात हो, चाहे स्वतंत्रता पाने की, चाहे फिर इमरजेंसी लगने की -उनके प्रभाव भारतीय जीवन पर, भारतीय समाज पर और खासतौर से ‘परिवार’-जो ‘एक धुरी’ होता है उस पर कैसे पड़ते हैं, उसको उठाया गया है। उपन्यास पारिवारिक मूल्यों के पतन की कहानी कहता है।

नए लेखकों के लेखन के बारे में आपके क्या विचार हैं?

लेखक को यह भी आना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है। हम हर चीज के बारे में यदि जल्दी-जल्दी लिख देें तो वो रचना नहीं हुई, शब्द-जाल हुआ। साहित्य तब बनता है जब पूरी किताब का एक रसात्मक प्रभाव पाठक पर पड़े। इसे हासिल करने के लिए सही भाषा चाहिए।

स्त्री-पुरुष के बनते-बिगड़ते संबंधों का जैसा चित्रण आपके कथा साहित्य में है यथार्थ में आज भी स्थिति वही है या आगे बढ़ गई है?

समय बदलता है तो समाज भी बदलता है और यथार्थ भी बदलता है। समाज मे आज लिव इन रिलेशनशिप शुरू हो गई है- हमारे भोपाल जैसी जगह पर भी यह देखने को मिलता है। आज लडक़ी अपनी मर्जी से शादी करना चाहती है। जब उसके मां-बाप उसे ऐसा न करने के लिए समझाते हैं तो वह उनसे दूर हो जाती है। अब यह गलत है या सही, साहित्य में ऐसे विषयों की पड़ताल होगी, इन विषयों पर कहानियां लिखी जाएंगी, समय के साथ संबंधों का रूप बदलता चलता है तो उनकी त्रासदी भी सामने आती है। साहित्य उन पर विचार करता है, नए प्रश्न खड़े करता है।

वर्तमान में नया क्या लिख रहे हैं?

हाल ही में लिखा गया उपन्यास छपकर आया है - ‘शाम की झिलमिल’। यह वृद्धों को लेकर लिखा गया है। एक वृद्ध हैं जिनकी पत्नी का देहांत हो गया है। वह अपने जीवन में खालीपन भरने के लिए कभी नौकरी और कभी पुरानी प्रेमिका के साथ रहने के बारे में सोचता है।

 

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