यदि कोई बीमार हो या दुर्घटना हो जाए तो ये देवदूत बन जाते हैं...

यदि बच्चे को कोई बीमारी हो जाए या दुर्भाग्यवश कोई दुर्घटना हो जाए और चिकित्सा सुविधाएं ( No medical facility here ) नहीं मिलें तो पीडि़त और उसके परिजनों पर कैसी गुजरती होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। हर एक कदम पर पहले रास्ता साफ करना पड़े । चंद किलोमीटर का सफर मरीज को सिर पर लादे हुए कई घंटों में तय करना पड़े तो इसे साहसिक और नेक काम ही कहा जा सकता है।

By: Yogendra Yogi

Published: 18 Feb 2020, 07:25 PM IST

जम्मू(योगेश): यदि बच्चे को कोई बीमारी हो जाए या दुर्भाग्यवश कोई दुर्घटना हो जाए और चिकित्सा सुविधाएं ( No medical facility here ) नहीं मिलें तो पीडि़त और उसके परिजनों पर कैसी गुजरती होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। इस पर भी यदि सुविधा मिल भी जाए तो रास्ते ऐसे दुर्गम (Roads are inaccessible ) हों कि उपचार के लिए ले जाने वाले की सांसे फूल जाएं। हर एक कदम पर पहले रास्ता साफ करना पड़े फिर मरीज को मुकाम तक ले जाने की कवायद की जाए। इसमें चंद किलोमीटर का सफर मरीज को सिर पर लादे हुए कई घंटों में तय करना पड़े तो इसे साहसिक और नेक काम ही कहा जा सकता है। यही नेक काम किया है लदï्दाख में संस्कार स्वयंसेवी संगठन के कार्यकर्ताओं ने।

बर्फीले रास्ते की चुनौती

यदि कोई बीमार हो या दुर्घटना हो जाए तो ये देवदूत बन जाते हैं...


लदाख के ज़ांस्कर में दो बच्चों की जिंदगी पर बन आई। एक बच्चा बुखार से तप रहा था और दूसरा पैर में फे्रक्चर से कराह रहा था। परिजनों के सामने मुश्किल यह थी कि बच्चों को बर्फीले रास्ते से कैसे ले जाया जाए। इसकी जानकारी संस्कार के कार्यकर्ताओं को मिली। स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं ने बुखार और दर्द से तड़पते बच्चों के इलाज की व्यवस्था की। रास्ते में कई फीट बर्फ के बावजूद कार्यकर्ताओं के दल ने बीमार बच्चों के साथ करीब तीन किलोमीटर पैदल का सफर तय किया।

बर्फ हटाई, एम्बुलेंस चलाई
मुश्किल हालात यहीं खत्म नहीं हुए। इसके बाद दोनों बच्चों को ले जाने के लिए एम्बुलेंस मिली किन्तु एम्बुलेंस भी बर्फ में चल नहीं पा रही थी। स्वयंसेवकों के रास्ते से बर्फ हटाने के साथ एम्बुलेंस चली। करीब 12 किलोमीटर के मार्ग में स्वयंसेवक लगातार बर्फ हटा कर एम्बुलेंस को आगे बढ़ाते रहे। कई घंटों के इस दुर्गम यात्रा के बाद एम्बुलेंस जांस्कर के कम्युनिटी हैल्थ सेंटर पदुम पहुंची। जहां पर बुखार से पीडि़त बच्चों को भर्ती किया गया। इस सेंटर पर फे्रक्चर के उपचार की सुविधा नहीं होने से पैर में फे्रक्चर वाले बच्चे को करीब २०० किलोमीटर दूर लेह में उपचार के लिए भेजा गया।

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