परवरिश की चुनौतियों के चलते मां-बाप बनने से गुरेज

जापान में 2019 में जन्म लेने वाले शिशुओं की संख्या लगभग 8.64 लाख होने की संभावना है। जबकि कुछ साल पहले यह आंकड़ा 9 लाख से नीचे आ गया था। बच्चों की जन्मदर को देखते हुए विशेषज्ञ न केवल चाइल्ड-सपोर्ट व्यवस्था को मजबूत करने का सुझााव दे रहे हैं बल्कि वे देश में बाल-सुलभ वातावरण बनाने पर भी जोर दे रहे हैं।

By: Mohmad Imran

Published: 06 Jan 2020, 09:35 PM IST

जापानी कामकाजी माता-पिताओं को बच्चों की देखभाल करने में मदद के सभी प्रयास विफल होते नजर आ रहे हैं। सरकार का प्रयास कामकाजी माता-पिताओं के बच्चों को प्रतीक्षा सूची से निजात दिलाना है लेकिन उनकी सभी चाइल्डकेयर सुविधाएं नाकाफी साबित हो रहे हैं। आज जापानी दंपती बच्चों की परवरिश से जुड़ी चुनौतियों को सोचकर माता-पिता बनने से भी संकोच कर रहे हैं। दरअसल जापान में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण श्रमशक्ति कमजोर होने लगी है। हालात ये है कि बीमार बच्चों की देखभाल के लिए भी छुट्टी लेने से सहयोगी कर्मचारियों पर काम का अतिरिक्त भार पड़ता है। सरकार की बच्चों की देखभाल के लिए की गई सरकारी व्यवस्थाएं भी कामकाजी माता-पिताओं की इस समस्या का निदान करने में विफल हो रही हैं। जापान में 2019 में जन्म लेने वाले शिशुओं की संख्या लगभग 8.64 लाख होने की संभावना है। जबकि कुछ साल पहले यह आंकड़ा 9 लाख से नीचे आ गया था। बच्चों की जन्मदर को देखते हुए विशेषज्ञ न केवल चाइल्ड-सपोर्ट व्यवस्था को मजबूत करने का सुझााव दे रहे हैं बल्कि वे देश में बाल-सुलभ वातावरण बनाने पर भी जोर दे रहे हैं।

परवरिश की चुनौतियों के चलते मां-बाप बनने से गुरेज

2004 में सरकार ने निम्न जन्मदर को बढ़ाने के लिए व्यापक उपायों की रूपरेखा तैयार की थी। इस योजना के तहत 2018 से 2020 तक तीन साल के दौरान लगभग 3.20 लाख जापानी बच्चों की माता-पिता की सहायत के रूप में देखभाल करने का लक्ष्य रखा गया था। अक्टूबर में सरकार ने प्राथमिक शिक्षा और बच्चों की देखभाल को भी निशुल्क कर दिया था। इन तथाकथित पारिवारिक सामाजिक योजना और चाइल्ड केयर पर होने वाला खर्च जापान के सकल घरेलू उत्पाद का 1.31 फीसदी हिस्सा था। इस बीच, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे अधिक जन्मदर वाले देशों ने सामाजिक एवं परिवार कल्याण योजनाओं पर अपनी जीडीपी का 3 फीसदी से अधिक खर्च किया। इन देशों से सबक लेते हुए जापान सरकार अब बच्चों के पालन में आ रहीं कमियों का दूर करने का बीड़ा उठाया है। सुधार के लिए व्यवस्थागत नीतियां तैयार की जा रही हैं। लेकिन इन सुधारों को धरातल पर इसे स्वाभाविक स्वरूप में नहीं उतारा जा रहा है जिस कारण लोग इन योजनाओं से अपनी इच्छा से नहीं जुड़ रहे हैं।

परवरिश की चुनौतियों के चलते मां-बाप बनने से गुरेज

स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के अनुसार 82.2 फीसदी कामकाजी माताओं ने 2018 में मातृत्व अवकाश ले लिया था। लेकिन 30 और 99 श्रमिकों वाले छोटे उद्योगों में काम करने वाली माताओं का प्रतिशत 76.3 फीसदी था। इसके अलावा 6.16 फीसदी ऐसे पुरुष कर्मचारी भी थे जिन्होंने पितृत्व अवकाश लिया था। ऐसे ही बीते साल 52.4 फीसदी कर्मचारियों ने सवैतनिक अवकाश लिया था। बहुत से लोग बच्चों के पालन-पोषण और घर की जिम्मेदारी से बचने के लिए शादी करने में भी संकोच कर रहे हैं।

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जापान में वर्तमान में शादियों में भी गिरावट आ रही है। साल 2000 में हुई 8 लाख शादियों की तुलना में 2016 में यह आंकड़ा घटकर 6 लाख पर आ गया है। वहीं 25से 39 साल की जापानी महिलाओं की कमी भी जन्मदर को प्रभावित कर रही है। 2000 में जहां इस आयु वर्ग की महिलाओं की आबादी 1.32 करोड़ थी वहीं जुलाई 2019 तक यह संख्या घटकर 97 लाख पर आ गई है। जापान के राष्ट्रीय जनसंख्या और सामाजिक सुरक्षा अनुसंधान विभाग के के अनुसार इस उम्र की महिलाओं की आबादी 2040 तक लगभग 81 लाख रह जाएगी। उस समय जापान में शिशुओं की संख्या घटकर 6.20 लाख से 8.30 लाख के बीच रह जाएगी।

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