scriptpoem by Saroj | मैं कविता हूं | Patrika News

मैं कविता हूं

Hindi Poem

जयपुर

Published: November 08, 2021 03:59:21 pm

डॉ. सरोज अर्गल

जब भी कोई होता उदास
या फिर नहीं सूझता मार्ग
तब मैं आ जाती हूं
और आत्मा से
निकले शब्द जुबां पर
कविता बन जाते हैं

इसीलिए मैं कविता हूं
मैं हूं वह अनजान कौंपल
मैं हूं वह नन्ही नन्ही घास
मैं हूं शब्दों की आस
उतार-चढ़ाव में रहती हूं
पर, प्रेरक बन जाती हूं
इसीलिए,
मैं कविता हूं
मैं भारत मां का आभूषण हूं
निस्तेज चेहरों में
प्राण फूंकने वाली हूं
इसीलिए,
मैं कविता हूं
इसीलिए मैं कविता हूं

---------
सर्वत्र
मैं कविता हूं
मैं कविता हूं
यहां हूं
वहां हूं कहां नहीं हूं मैं
धरती,नभ और पाताल
सर्वत्र हूं।
नवजीवन की जननी हूं
वक्त पड़े तब
शक्ति रूपा मां जगदंबा हूं
फिर क्यों?
मैं अपने होने का प्रमाण दूं?
जब मुझसे ही है
अस्तित्व जहां का
फिर क्यों ?
अपने अस्तित्व के लिए
अग्निपरीक्षा दूं
हर मंजिल की राह हूं मैं
उपवन के खिलते
फूलों की महक हूं मैं
आशा के सूरज की
रोशनी हूं मैं
शरद पूर्णिमा के चांद की
अमृत रूपी, बरसती हुई
किरण हूं मैं
मैं सर्वत्र हूं

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