scriptPoem by Shakuntala | कविता-सांसों की माला | Patrika News

कविता-सांसों की माला

Hindi poem

जयपुर

Published: November 08, 2021 03:33:04 pm

शकुंतला अग्रवाल

सांसों की माला टूट गई तब,
जोडऩे वाला कोई नहीं,
यौवन के मद में भरके बन्दे,
तू इतना इतराता है,
तुझे सुबह-शाम का पता नहीं,
फिऱ भी तू गणित लगाता है,
यौवन तेरा ढलने लगा जब,
चाम का प्यारा कोई नहीं,
सांसों की माला टूट गई तब,
जोडऩे वाला कोई नहीं।
कविता-सांसों की माला
कविता-सांसों की माला
माटी तेरा जिस्म बनेगा,
राख उड़ेगी इक पल में,
यार-दोस्त तेरे सगे-सम्बन्धी,
रो-रोकर नीर बहाएंगे,
जो तुझसे लिपटे जाते थे,
वही खौफ खाएंगे,
सांस तन से निकल गई तो,
जग में रखइया कोई नहीं,
सांसों की माला टूट गई तब,
जोडऩे वाला कोई नहीं।
तन-मन तूने होम किया है,
जिनको आज बनाने में,
घर हो या महल-दुमहले,
सभी यहीं रह जाएंगे,
संग में तेरे कफन चलेगा,
संग में चलैया कोई नहीं,
सांसों की माला टूट गई तब,
जोडऩे वाला कोई नहीं।

यारे-प्यारे सगे-सम्बन्धी,
जल्दी तुझे उठाएंगे,
ले जाकर तुझको बन्दे,
अग्नि में वो जलाएंगे,
कपाल क्रिया तेरी होगी,
'शकुन' तुझको बचैया कोई नहीं,
सांसों की माला टूट गई तब,
जोडऩे वाला कोई नहीं।।

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