ये विद्रोही कवि पत्नी के लिए लिखता था प्यार भरे गीत, ऐसे कर दी गई हत्या...

ये विद्रोही कवि पत्नी के लिए लिखता था प्यार भरे गीत, ऐसे कर दी गई हत्या...

Navyavesh Navrahi | Publish: Nov, 14 2017 08:49:31 PM (IST) स्‍पेशल

महज 35 साल की उम्र में कर दी थी हत्या, कई भाषाओं में हुआ रचनाओं का अनुवाद...

नई दिल्ली। कवियों को कोमल हृदय माना जाता है। कई बार ये इतने व्रदोही हो जाते हैं कि सत्ता भी उनके शब्दों से डरने लगती है। ऐसे ही कवियों में शुमार थे हंगरी के ये कवि। उन्हें भले ही विद्रोही कवि के रूप में दुनिया भर में जाना जाता हो, लेकिन वे अपनी पत्नी के लिए प्यार भरे गीत लिखा करते थे। उनके समय में ये काफी चर्चित भी हुए। आइए इस कवि के बारे में और जानें और पत्नी के लिए लिखी उनकी रचनाएं भी पढ़ें...

पत्नी के लिए लिखता था प्यार भरे नग्मे
पत्नी के लिए प्यार भरे नग्मे लिखने वाले ये कवि थे- कवि थे मिक्लोश रादनोती। हंगरी के बूढापेस्ट में 5 मई 1909 को इनका जन्म एक यहूदी परिवार में हुआ था। उन्हें आधुनिक हंगेरियन कविता के महत्वपूर्ण कवियों में शुमार किया जाता है। वे कई भाषाओं के जानकार थे। इसलिए उन्हें महज एक कवि के रूप में ही नहीं जाना जाता था। बल्कि ग्रीक, लेटिन व अन्य भाषाओं से हंगेरियन में कई महान रचनाओं के अनुवाद के लिए भी जाने जाते हैं। वे अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थो और उनके लिए गीत भी लिखे।

miklos radnoti
IMAGE CREDIT: google

35 साल की उम्र में नाजियों ने कर दी हत्या
अपने अंकल के साथ टैक्सटाइल के व्यापार में काम करने के अलावा मिक्लोश ने कई स्थानीय पत्रिकाओं के लिए भी काम किया। इसी दौरान वे कई तरह के अंदोलनों में शामिल होने लगे। उनकी कविताएं ऐसी थीं कि राजनीतिक गलियारों तक में उनकी चर्चा होती थी। इस विद्रोही कवि की 35 साल की उम्र में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 9 नवंबर 1944 को नाजियों ने हत्या कर दी।

कई भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद
मिक्लोश की रचनाओं का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। हिन्दी में इनके अनुवाद हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने किए हैं। इनमें नए चांद की रात, एक प्रकृतिपूजक का स्वागत,नए चरवाहों का गीत, ’चलते रहो, तुम मृत्यु-अभिशप्त' और आसमान में झाग उठ रहे हैं शामिल हैं।

यहां प्रस्तुत हैं मिक्लोश की रचनाएं...


तुम्हारी बांहों में
तुम्हारी बांहों में झूल रहा हूं मैं
चुपचाप
मेरी बांहों में झूल रही हो तुम
चुपचाप
तुम्हारी बांहों में मैं एक बच्चा हूं
जो चुप है
मेरी बांहों में तुम एक बच्चा हो।
मैं तुम्हें सुनता हूं
तुम मुझे अपनी बांहों में लेती हो
जब मैं डरता हूं
तो तुम्हें अपनी बांहों में लेता हूं
और मैं डरा हुआ नहीं हूं
मौत का गहरा सन्नाटा भी तुम्हारी बांहों में
मुझे डरा नहीं सकता
तुम्हारी बांहों में मैं
मौत से उबर आऊंगा
एक सपने की तरह।
रचनाकाल : 20 अप्रैल 1941

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न याद न जादू
अब तक मेरे दिल में सारा गुस्सा इस तरह छिपा रहता था
जैसे सेब के बीचोबीच गहरे भूरे रंग के बीज छिपे रहते हैं।
और मैं जानता था कि मेरे पीछे–पीछे हाथ में तलवार लिए एक फरिश्ता चलता है
जो मुसीबत के व$क्त मेरी हिफाजत करता है, मुझे बचाता है।
लेकिन किसी बीहड़ दिन तुम सुबह उठो और पाओ
कि सब कुछ बर्बाद हो चूका है और तुम भूत की तरह निकल जाते हो
अपनी जो थोड़ी बहुत चीज़ें थीं उन्हें छोड़कर, करीब–करीब नंगे,
तो तुम्हारे खूबसूरत दिल में, जो अब हल्का हो चुका है,
एक वयस्क नम्रता जागने लगती है, संजीदा, संकोची
और अगर तब तुम कहोगे विद्रोह तो दूसरों के लिए कहोगे और वैसा नि:स्वार्थ करोगे

और यह एक ऐसे मुक्त भविष्य की आशा में कहोगे जो दूर से ही दमक रहा है।
मेरे पास कभी कुछ नहीं था और न आगे कभी होगा
जाओ और ज़रा एक लम्हे के लिए मेरी जि़न्दगी की इस दौलत पर विचार करो

मेरे दिल में कोई गुस्सा नहीं है, बदले की मुझे परवाह नहीं
यह दुनिया फिर से बनाई जाएगी--मेरी कविताओं पर रोक लगने दो
मेरी आवाज़ हर नई दीवार की नींव के पास सुनी जाएगी
अपने में मैं वह सब कुछ जी रहा हूं जो बाकी दिनों में मुझ पर होगा
मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं किसी भी तरह नहीं बचता
न मुझे कोई याद बचाएगी न कोई जादू--मेरे ऊपर का आसमान मनहूस है
अगर तुम मुझे कहीं देखो दोस्त तो कंधे झटक देना और मुड़ जाना
जहां पहले तलवार के लिए एक $फरिश्ता था
वहां शायद अब कोई नहीं है।
अंग्रेजी से अनुवाद: विष्णु खरे

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