स्कूली शिक्षा में विकसित देशों को पीछे छोड़कर सिरमौर बने हुए हैं ये देश

Dhirendra Mishra

Publish: Oct, 11 2017 12:36:06 (IST)

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स्कूली शिक्षा में विकसित देशों को पीछे छोड़कर सिरमौर बने हुए हैं ये देश

लोगों में यह आम धारणा है कि हर स्तर पर शिक्षा के मामले में अमरीका और ब्रिटेन वाले सबसे आगे हैं, पर ऐसा नहीं दुनिया के छोटे-छोटे देशों की आदर्श स्कूली

 

डब्लूईएफ जारी करती है रैंकिंग

विश्व आर्थिक मंच (डब्लूईएफ) बेहतर स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर रैंकिंग प्रतिस्पद्र्धा, माइक्रो इकोनॉमिक एनवायर्नमेंट, आधारभूत ढांचा, स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा मॉडल और श्रम बाजार की क्षमता के आधार पर जारी करता है। इसके लिए आंकड़े शोध और अनुसंधान के जरिए हासिल किए जाते हैं। इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि वहां की शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था ग्लोबज स्टैंडर्ड के लिहाज से पूरी तरह प्रतिस्पर्धी हो। इन सभी इन मानदंडों का गहनता के साथ अध्ययन व विश्लेषण करने के बाद ही रैंकिंग की घोषणा की जाती है।

 

आदर्श स्कूली शिक्षा देने वाले दुनिया के देश


फिनलैंड
फिनलैंड में नियमित रूप से वैश्विक शिक्षा प्रणालियों की रैंकिंग में सबसे ऊपर रहा है। यहां सभी छात्रों के लिए एक समान शिक्षा प्रणाली लागू है। एक ही तरह के स्कूलों में सभी को पढ़ाया जाता है। यहां पर गरीब व अमीर लोगों के बीच असमानता दर दुनिया में सबसे कम है। 16 साल की उम्र में पहली बार अनिवार्य रूप से टेस्ट में शामिल होना होता है। पहले सात वर्षों तक होमवर्क देने की परंपरा नहीं है। यह काम शिक्षक स्कूल में कराते हैं।

स्विट्जरलैंड
स्विट्जरलैंड में सिर्फ पांच फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। क्षेत्र के हिसाब से जर्मन, फ्रेंच व इटालियन में शिक्षण की व्यवस्था है। माध्यमिक स्कूल के बाद रुचि के अनुरूप संकायों में बांटा जाता है। शिक्षक काफी योग्य होते हैं।

बेल्जियम
बेल्जियम में स्कूली शिक्षा के स्तर पर ही छात्रों की अभिरुचि और बौद्धिक क्षमता के आधार पर शिक्षा का संकाय तय कर दिया जाता है। प्राइमरी शिक्षा को सर्वोच्च दर्जा हासिल है। सरकार जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करती है।

सिंगापुर
सिंगापुर की शिक्षा व्यवस्था दुनिया के देशों के लिए एक आदर्श मॉडल है। यहां छात्रों को 21वीं सदी की शिक्षा देने पर सरकार का जोर है। पाठ्यक्रमों को पूरा करने कि लिए तथ्यों व प्रक्रियाओं पर बल देते हुए छात्रों को ग्लोबल स्टैंडर्ड बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं।

नीदरलैंड
नीदरलैंड के छात्रों को सबसे ज्यादा खुशनसीब छात्र बताया जाता है। सभी को दबावमुक्त ग्लोबल एजुकेशन देने की व्यवस्था है। 5 से 18 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य है। अधिकारी प्रतिबद्ध होते हैं।

कतर
कतर स्कूली शिक्षा स्तर निशुल्क है। नवाचार में दुनिया का अग्रणी देश है। सरकार 2030 तक कतर को बेस्ट स्कूल एजुकेशन सिस्टम बनाने पर काम कर रही है।

आयरलैंड
सरकारी सहायता से निजी स्कूल बच्चों को शिक्षा देते हैं। सरकार का जोर व्यावसायिक शिक्षा देने पर है। 6 से 16 साल तक के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य है।

एस्तोनिया
स्कूली शिक्षा पर जीडीपी का पांच से सात फीसदी तक खर्च करता है। शिक्षा का मकसद सभी बच्चों के लिए आदर्श वातावरण का निर्माण करना है, ताकि व्यक्तित्व विकास, पारिवारिक और राष्ट्रवादी मूल्यों को बढ़ावा मिले।

न्यूजीलैंड
न्यूजीलैंड में 6 से 16 साल तक के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य है। यहां घर के पास वाले स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था की जाती है। यहां भी स्कूली शिक्षा ग्लोबल स्टैंडर्ड पर जोर दिया जाता है। साथ ही छात्रों की मौलिक प्रतिभा विकास प्राथमिकताओं में शामिल है।

बारबाडोस
बारबाडोस की सरकार स्कूल शिक्षा पर बड़े पैमाने पर खर्च करती है। वहां पर साक्षरता दर 98 फीसदी है, जो कि दुनिया के टॉपमोस्ट में से एक है। स्कूली शिक्षा सरकार की ओर से संचालित है और सारा खर्च भी वहां की सरकारें ही वहन करती हैं।

जापान
जापान में स्कूली शिक्षा के बाद यह तय किया जाता है कि छात्र को किस स्ट्रीम या यूनिवर्सिटी में पढ़ाने की जरूरत है। हाई स्कूलिंग की शिक्षा वहां पर अनिवार्य शर्त नहीं है। इसके बावजूद हाई स्कूल में प्रवेश दर 98 फीसदी से अधिक है।

किस बात पर है इन देशों का जोर
- 21वीं सदी की शिक्षा की सुविधा मुहैया कराने पर इन देशों की सरकारों का है जोर।
- बच्चों को स्ट्रेसलेस शिक्षा के साथ मौलिक प्रतिभा का विकास इन देशों की सरकारों की प्राथमिकता में है सबसे ऊपर

इन देशों से सीखे भारत
उच्च शिक्षा के मामले में भले ही अमरीका और ब्रिटेन की तूती बोलती है, लेकिन बेहतर स्कूली शिक्षा की बातें आती हैं तो विकसित देशों को चुनौती देते नजर आते हैं छोटे-छोटे देश। विश्व आर्थिक मंच की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि इस मामले में अमरीका, ब्रिटेन और चीन टॉप देशों की सूची में शामिल नहीं हैं। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में दुनियाभर में शुमार इन देशों की खासियत यह है कि यहां की सरकारें सभी नागरिकों को स्कूली शिक्षा मुहैया कराना खुद की जिम्मेदारी मानती हैं। सरकारी बजट से इस पर खर्च किया जाता है। साथ ही शिक्षकों की गुणवत्ता से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाता है। भारत सरकार को भी इस मामले में सीख लेने की जरूरत है।

कितना होता है स्कूली शिक्षा पर जीडीपी का खर्च
बारबाडोस ७.५ फीसद
न्यूजीलैंड ७.२ फीसद
फिनलैंड ६.८ फीसद
बेल्जियम ६.६ फीसद
आयरलैंड ६.५ फीसद
नीदरलैंड ०६ फीसद
एस्टोनिया ५.७ फीसद
स्विट्जरलैंड ५.४ फीसद
जापान ३.८ फीसद
कतर ३.६ फीसद
सिंगापुर ३.१ फीसद

 

 

 

 

 

 

 

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