पश्चिम के 'व्यक्तिवाद' में जकड़ा मध्य-पूर्व क्या अपने सामाजिक ढाँचे को बचा पायेगा?

मध्य पूर्व के देशों में पारिवारिक संरचना ही वहां की वंशानुगत परंपरा का सबसे उज्ज्वल पक्ष रही है। लेकिन बीते कुछ सालों से पश्चिमीकरण की बयार ने इस सामुदायिक विरासत को झकझोर कर रख दिया है। अब परिवार बिखर रहे हैं और एकलवाद की विचारधारा तेजी से उदय हो रही है।

By: Mohmad Imran

Published: 06 Jan 2020, 08:07 PM IST

बीते दो महीनों से मध्य-पूर्व (middle east) में लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के पीछे कई राजनीतिक-आर्थिक कारण है। तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है, भ्रष्टाचार चरम पर है और तानाशाही (dictatorship) से आम जनता त्रस्त हो चुकी है। बेरूत, बगदाद, तेहरान और अल्जीरिया में प्रदर्शनकारी इन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। इराक में, नागरिकों को ईरान और उसके मिलिशिया चरमपंथियों का भय है, वहीं अल्जीरिया में नागरिकों की शिकायत है कि सत्तारूढ़ जेरोंटोक्रेसी (gerontocracy or बूढ़ों के प्रभुत्व वाली सरकार) वांछित सुधार लाने के अपने वादे को पूरा करने में विफल रहा है। लेकिन इन तमाम राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल के बीच अब पश्चिम में जन्मा 'व्यक्तिवाद' (individualism) भी मध्य-पूर्व में तेजी से उदय हो रहा है। मध्य-पूर्व के देशों में समाज लंबे समय तक भरोसे के पीढ़ीगत नेटवर्क पर निर्भर रहे हैं, जिनमें समाज की सबसे छोटी इकाई परिवारों से लेकर, गांव, जनजाति और अन्य संघों के लोग शामिल हैं। लेकिन अब व्यक्तिवाद वहां भी हावी हो रहा है।

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मध्य-पूर्व में भी पश्चिमीकरण
मध्य-पूर्व के देश भी सामाजिक रूप से पश्चिमीकरण (westernisation) को अपना रहे हैं। बावजूद इसके वे अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान बनाए हुए हैं। लेकिन अब वे परमाणु शक्ति (nuclear power) से लैस सामाजिक संगठन की ओर बढ़ रहे हैं। यूरोप और अमरीका लंबे समय से इसके प्रतीक राष्ट्र रहे हैं। मध्यपूर्व के लोग अब कई देशों में जा बसे हैं। आर्थिक हालात उनके कामकाज पर आधारित है न कि उनकी मूल पहचान पर। दो दशक पहले हार्वर्ड विश्वविद्यालय (harverd university) के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रॉबर्ट पुटमन ने अमरीका के बारे में अपनी किताब 'बाउलिंग अलोन' (boiling alone) में कहा था कि अमरीकी सामाजिक में आ रही गिरावट एक गंभीर समस्या है जो आने वाले दशकों में गहरा असर डालेगी। लेकिन यह पतन मध्यपूर्व में और भी तेजी से उभर रहा है। टुकड़ों में बंटा समुदाय सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे रहा है।

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युवाओं में बेरोजगारी बढ़ा रही असंतोष
मध्य-पूर्व के देशों में युवाओं के लिए रोजगार का संकट खड़ा हो गया है, जो उनके असंतोष को और हवा दे रहा है। एक समय युवाओं को नौकरियां दिलाने में उनके परिवार और जनजातियां मदद करते थे। लेकिन अब ये भाव कम हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश में बाजारोन्मुख सुधार सामने आते हैं भाई-भतीजावाद (napotizm) की विवादास्पद परिपाटी भर्ती प्रक्रियाओं को प्रभावित करने लगती है। इसके अलावा पहले जहां रोजगार, परिवार और समय का महत्त्व एक दूसरे से जुड़े हुए थे अब ज्यादातर ने सहूलियत के अनुसार इसे प्राथमिकताओं में बांट दिया है। युवा माता-पिता अपने बच्चों के साथ ज्यादा समय बिता रहे हैं। इसके चलते वे अपने बुजुर्ग माता-पिता और भाई-बहनों से दूर होते जा रहे हैं।

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एकल परिवारों में बदल रहे
ग्रामीण अपनी बुनियादी सामाजिक जरूरतों के लिए अपने आसपास के लोगों पर भरोसा करते हैं। पड़ोसी एक-दूसरे को पीढिय़ों से जानते हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और ट्यूनीशिया के शहरों में रहने वाले लोग अब अपने पड़ोसियों को ज्यादा अच्छी तरह से नहीं जानते हैं। संयुक्त परिवार (joint family) अब एकल परिवारों (nuclear family) में बदल रहे हैं। सामाजिक मेल-मिलाप हाशिए पर पहुंचने लगा है। युवा ऐसे सामाजिक कार्यक्रमों से अनुपस्थित रहते हैं और दोस्तों के साथ मॉल में दिन बिताना पसंद कर रहे हैं। कभी साप्ताहिक मेल-मिलाप में पूरा दिन गुजर जाया करता था लेकिन अब यह सामाजिक परंपरा महज कुछ घंटों में सिमट गयी है।

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कीमत भी चुका रहा समाज
विकल्पों का चुनाव कई मायनों में अच्छा है, लेकिन समाज को इसकी एक भारी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। अमरीका के राजनीतिक और सामाजिक संस्थानों में व्यक्तिवाद की परंपरा पनप रही है। लोकतांत्रिक, राजनीतिक, धार्मिक स्वतंत्रता और गतिशील श्रम बाजारों में मिलने वाली संवैधानिक गारंटी अमरीकी समाज की अलग विशेषता है, व्यक्तिगत पहचान को भी आधार देती है। जब समूह और सम्प्रदाय का पतन होता है व्यक्तिवाद बढ़ता है। इसलिए पश्चिमीकरण के बीच अरब को भी ऐसे संवैधानिक संस्थान (constitutional institutes) विकसित करने होंगे, जो वर्ग संघर्ष के बीच समाज को बांधे रखे।

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इन बातों से समझें फर्क
अरब समाज में अब दो बातें संभव नजर आ रही हैं। पहला मध्य-पूर्व देशों की सरकारें अपने नागरिकों के साथ जुडऩे के नए तरीके विकसित करने का प्रयास करेंगी। वहीं सरकारें अब सरकारी नौकरी देने, अंतर्राज्यीय विवादों की मध्यस्था और समूह कल्याणों में स्थिरता बनाए रखने की अपनी 'जिम्मेदारियों' से पीछे हटने लगेंगी क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक फायदे के लिए समाज के संरक्षण समूहों को अपनी गोद में बिठा लिया था जो अब उनके लिए बोझ बन जाएंगे। दूसरा, युवा रिश्तों की बजाय पसंद के आधार पर अपने निकट संबंधों को प्राथमिकता देने लगेंगे। अच्छी बात ये है कि इससे नए समूहों के लिए मार्ग प्रशस्त होगा और रचनात्मकता को बढ़ावा मिलेगा।

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