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सरकार जागो!

उदयपुर में क्या सिर्फ कन्हैयालाल साहू का कत्ल हुआ? नहीं... वहां कत्ल हुआ समूचे सरकारी तंत्र का

जयपुर

Published: June 29, 2022 11:20:24 pm

अमित वाजपेयी
उदयपुर में क्या सिर्फ कन्हैयालाल साहू का कत्ल हुआ? नहीं... वहां कत्ल हुआ समूचे सरकारी तंत्र का। कत्ल हुआ पुलिस पर कायम विश्वास का। कत्ल हुआ सौहार्द और आपसी भाईचारे का। कत्ल हुआ राज्य की कानून-व्यवस्था का। अब भले ही राज्य सरकार और पुलिस एवं प्रशासन यह कहकर पल्ला झाड़ ले कि यह तो दो सिरफिरों की करतूत है लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर उनमें ऐसा दुस्साहस करने की हिम्मत आई कहां से? यह हिम्मत उनमें एकाएक नहीं आई। बल्कि वोट तंत्र ने उनको यह दुस्साहस करने की ताकत दी।
udaipur murder

भाजपा से निष्कासित नेत्री नूपुर शर्मा के विवादित बयान के बाद बूंदी के एक मौलाना और उसके साथियों ने राज्य में सबसे पहले क्रूर ऐलान '...सिर तन से जुदा' किया। यकीन कीजिए, कत्ल का यह ऐलान खुलेआम पुलिस की मौजूदगी में जिला कलक्टर के दफ्तर के बाहर किया गया। हुआ क्या? आश्चर्य करेंगे... उसकी न गिरफ्तारी हुई और न ही सजा। बस मुकदमा भर कायम हुआ।

इसके उलट कन्हैयालाल के साथ क्या हुआ? उसने नूपुर के समर्थन के एक पोस्ट की। हुआ क्या? पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया। उसे कोर्ट से जमानत मिली। ज्यों ही जेल से छूटा, उसे कत्ल करने की धमकियां मिलने लगीं। असहाय कन्हैयालाल सुरक्षा की आस लिए पुलिस की दहलीज पर पहुंचा।

कन्हैया के साथ जो और जैसी क्रूरता हुई, वह अक्षरश: उसने पहले ही अपनी शिकायत में लिखकर पुलिस को सौंप दी थी। कन्हैया को तो अपना काल नजर आ रहा था लेकिन पता नहीं किसके दबाव में पुलिस आंखें बंद करे बैठी थी। नतीजतन कातिलों को धार्मिक उन्माद फैलाने का हौसला मिला और उन्होंने बेखौफ होकर उसका 'सिर तन से जुदा' कर दिया। अब सोचिए, यदि राज्य सरकार और पुलिस ने बूंदी की इस क्रूर बयानबाजी का तत्काल 'सिर कुचल' दिया होता तो क्या कातिलों की ऐसा दुस्साहस करने की औकात होती? जवाब है नहीं... दरअसल जब राजस्थान में डॉक्टर्स के तबादलों को भी योग्यता और जरूरत की बजाय धर्म से जोड़ दिया जाए तो यह हालात कायम होना लाजिमी है।
चिकित्सा मंत्री ने पिछले दिनों कुछ डॉक्टर्स के तबादले किए। जवाब में किशनपोल से कांग्रेस विधायक अमीन कागजी यह शिकायत लेकर मंत्री के पास पहुंच गए कि तबादला सूची में उनके विधानसभा क्षेत्र से 4 अल्पसंख्यक डॉक्टर्स भी शामिल हैं। वह धार्मिक आधार पर तबादले रद्द करवाकर ही माने।

यह दुर्दांत हत्याकांड साक्ष्य है, इस बात का कि पुलिस की गैर-जिम्मेदारी और अदूरदर्शिता ने ही वैमनस्यता का बीज बो दिया है। बीते कुछ सालों से राजस्थान लगातार धार्मिक उन्माद का दंश झेल रहा है। कभी करौली में रामनवमी के जुलूस पर पथराव तो कभी भीलवाड़ा, जोधपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद में दंगे। सिलसिलेवार धार्मिक उन्माद बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है, किसी भी वारदात से पहले और बाद में वैमनस्यता बढ़ाने वाले नेताओं के बयान। घिनौनी सियासत का यह भद्दा रूप है।

गलती आमजन की भी है। जो सोशल मीडिया के चंगुल में ऐसी फंसी है कि उसके लिए अपने क्षेत्र, शहर, राज्य और देश की शांति से ज्यादा भड़काऊ बयान एवं वीडियो आगे से आगे 'फॉरवर्ड' करना ज्यादा जरूरी है। आज युवा को जाति और धर्म नहीं बल्कि अपने कॅरियर की चिंता ज्यादा है। नौकरी आसानी से मिल नहीं रही। नित नए दिन बेरोजगारी रेकॉर्ड बना नहीं है। ऐसे में बड़ी चिंता यह है कि कहीं सोशल मीडिया का यह घिनौना खेल अब उस शिक्षित बेरोजगार को इस धार्मिक उन्माद की दिशा में न धकेल दे।

अब राज्य में शांति का एकमात्र तरीका यही है कि एक-दूसरे के धर्मों और सिद्धांतों को राजनीतिक हथियार न बनने दें। इससे सांप्रदायिक वैमनस्यता बढ़ाने वालों को सख्त संदेश मिलेगा। कट्टरपंथी तत्वों, नफरत फैलाने और सांप्रदायिक हिंसा करने वालों को कदापि नहीं बख्शा जाए।

सरकार और पुलिस को भी चाहिए कि कर्रवाई की जैसी तत्परता उन्होंने कन्हैयालाल की विवादित पोस्ट पर दिखाई, वैसी ही तेजी अब वह इन दुर्दांत कातिलों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में दिखाए। कातिलों ने हत्याकांड के और हत्या के बाद इत्मीनान से जो वीडियो बनाकर वायरल किए, उन्हें देखने के बाद अब राजस्थान तो चाहता है कि अब इन दुर्दांत कातिलों को सजा-ए-मौत ही मिले।
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Amit Vajpayee

अपराध, राजनीति, औद्योगिक एवं ढांचागत विकास, खेल और फिल्मों के मसलों में गहरी रूचि। विशेष मुददों को लेकर कॉलम 'दो टूक' के लेखक। पत्रकारिता में 23 साल से सक्रिय। अजमेर, कोटा, जयपुर और भोपाल में काम किया। वर्तमान में जयपुर में पदस्थापित और राज्य सम्पादक का दायित्व।

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