पिता की मौत के बाद भी नहीं थमें योगेश्वर दत्त, पदक जीत कर दी थी श्रद्धांजलि, निजी जिंदगी में भी दी है बड़ी मिसाल

कुश्ती के खेल में कई ऐसे भारतीय सितारे हैं, जिनकी धमक पूरी दुनिया में है। योगेश्वर दत्त उन्हीं पहलवानों में एक हैं।

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Updated: 13 Nov 2017, 10:29 PM IST

नई दिल्ली। कुश्ती वो खेल है, जो भारत के रग-रग में समाया हुआ है। कस्बों-शहरों से लेकर सुदूर गांव तक भारतीय बच्चे कुश्ती खेलते-खेलते बड़े होते हैं। यह और बात है कि बचपन में खेले जाने वाला कुश्ती खेल के अनुशासन में बंधा नहीं होता। लेकिन ऐसा शायद ही कोई भारतीय होगा जिसने अपने बचपन में कुश्ती कभी नहीं खेली हो। आज क्रिकेट, बैडमिंटन, हॉकी जैसे खेलों के साथ-साथ कुश्ती को भी भारत में अगाध प्रेम मिल रहा हैं। लोग न केवल कुश्ती की प्रतियोगिताएं देखते है, बल्कि अपने चहेते पहलवान से जुड़ी हर एक कहानी को बड़े ध्यान से पढ़ते और देखते है। आज कुश्ती को जो लोकप्रियता मिली है, उसमें चंद भारतीय पहलवानों की बहुत बड़ी भूमिका है। ये वो पहलवान है, जिन्होंने देश की सीमा से बाहर निकल कर अपने बेहतरीन खेल कौशल के बल पर बड़ी कामयाबी हासिल की है। आज वो बेशक कामयाबी के शिखर पर हो, पर इस मुकाम को हासिल करने के लिए इन्होंने बहुत कुछ कुर्बान किया है।

हरियाणा के सोनीपत से हैं योगेश्वर
कुश्ती के खेल में कई ऐसे भारतीय सितारे हैं, जिनकी धमक पूरी दुनिया में है। योगेश्वर दत्त उन्हीं पहलवानों में एक हैं। 36 वर्षीय योगेश्वर ने न केवल अपना बल्कि भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। योगी के उपनाम से मशहूर योगेश्वर दत्त का जन्म 2 नवंबर 1982 हरियाणा के सोनीपत में हुआ था। योगेश्वर के पिता राम मेहर और माता सुशीला देवी दोनों शिक्षक थे। इनका परिवार एक मध्यम वर्गीय परिवार था। हालांकि परिवार में शिक्षा की बड़ी भूमिका थी। परिवार को बच्चे बेहतर शिक्षा हासिल करें इसका पूरा ध्यान दिया जाता था। माता-पिता दोनों शिक्षक थे इस कारण योगी पर पढ़ने-लिखने का दवाब भी था। लेकिन बचपन में ही योगी को पहलवानी और कुश्ती में गहरी रूचि आ गई। गांव के ही बलराज नामक पहलवान के किस्से सुन-सुन कर योगी में भी पहलवानी करने का ऐसा चस्का लगा कि आज वो बड़े-बड़े पहलवानों को चित कर रहे हैं।

8 साल उम्र से शुरू की पहलवानी
योगी ने 8 साल की उम्र से पहलवानी करनी शुरू की। सोनीपत की मिट्टी में पहलवानी सीख रहे इस बच्चे के बारे में तब कोई यह नहीं जानता था कि योगी आगे चल कर भारत के इतने बड़े पहलवान बन जाएंगे। योगी ने अपने स्कूली जीवन में कुश्ती की कई प्रतियोगिताएं लड़ी। जिनमें कुछ में उन्हें जीत भी नसीब हुई। साल 1994 में योगी ने पोलैंड में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल कैडेट खेल प्रतियोगिता में भाग लिया। यहां योगी के बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक पर अपना कब्जा किया। इस प्रदर्शन के बाद योगेश्वर के माता-पिता भी यह मान गए कि इसका भविष्य कुश्ती में ही है। साल 1996 में योगी ने अपनी पढ़ाई पूरी की। जिसके बाद योगी ने कुश्ती में अपना करियर बनाने के लिए दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम आ गए। जहां से इनके करियर का आगाज हुआ।

2003 में मिली बड़ी सफलता
योगेश्वर दत्त को बड़ी सफलता 2003 में मिली। योगी लंदन में आयोजित कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने में कामयाब हुए। इसके बाद योगेश्वर दत्त की सफलता का कारवां चल पड़ा। वे सन 2004 के एथेंस ओलंपिक के लिए भारतीय कुश्ती दल में चुने गए। हालांकि एथेंस में योगी बड़ा कारनामा कर पाने में नाकाम रहे। योगी यहां 55 किलो ग्राम भार वर्ग में 18वें स्थान पर रहे।

पिता की मौत के बाद भी जीता पदक
साल 2006 योगी के लिए मिला-जुला रहा। इस साल योगी को एक साथ कई समस्याओं से पार पाना पड़ा। योगी के पिता राम सुमेर का 3 अगस्त 2006 को निधन हो गया। पिता की मौत से मात्र 9 दिन पहले योगी दोहा में आयोजित एशियाई गेम्स में हिस्सा लेने के लिए जा चुके थें। योगी को पिता की मौत का समाचार दोहा में ही मिला। इसके बावजूद योगी रिंग में उतरे और अपने विरोधी पहलवान को चित करते हुए कांस्य पदक जीतने में कामयाब रहे।


लंदन ओलंपिक में जीता कांस्य
साल 2008 में एशियाई जेजू सिटी दक्षिण कोरिया में आयोजित चैंपियनशिप को जीत कर योगेश्वर बीजिंग ओलंपिक में क्वालीफाई करने में कामयाब रहे। हालांकि बीजिंग ओलंपिक में भी योगी को निराशा हाथ लगी। इसके बाद भी योगी ने संघर्ष का रास्ता नही छोड़ा। वे 2010 में दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में चोटिल होने के बावजूद गोल्ड मेडल जीतने में कामयाबी हासिल की। योगेश्वर दत्त ने साल 2012 में कुश्ती की 60 किग्रा फ्रीस्टाइल स्पर्धा में कांस्य पदक जीता था। जिससे उनका चयन लंदन ओलंपिक के लिए हुआ। जहां दत्त ने इस बार अपने प्रशंसकों को निराश नहीं किया। लंदन ओलंपिक में योगी ने 60 किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीत कर पूरी दुनिया में अपना नाम रोशन कर दिया।

 

susil kumar

2014 में हासिल किया सुनहरा तमगा
2012 में लंदन ओलंपिक्स में कांस्य पदक जीतकर वें के.डी जाधव 1952, सुशील कुमार 2008 और 2012 के बाद रैस्लिंग में पदक जीतनेवाले तीसरे खिलाडी बने। कांस्य पदक के मुकाबले के लिए उन्होंने उत्तर कोरिया के री जोंग मियोंग को हराया। 2014 में ग्लासगो के कामनवेल्थ खेलों में उन्होंने 65 किलो रैस्लिंग वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल क़िया। उन्होंने फाइनल में कनाडा के जेवोन बाल्फोर को 10-0 से हराया था। कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में योगेश्वर दत्त ने 65 किलोग्राम भार वर्ग में फ्रीस्टाइल कुश्ती में कनाडाई पहलवान को हराकर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था।

टोक्यो में सोना जीतने पर नजर
योगेश्वर की उपरोक्त उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने 2012 में उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न के सम्मान से नवाजा। बात योगी की निजी जिंदगी की करें तो योगी ने यहां भी बड़ी मिसाल पेश की है। योगेश्वर ने शादी कर दहेज़ में मात्र 1 रूपए ले कर एक मिशाल कायम की, उन्होंने कांग्रेस नेता जयभगवन शर्मा की एकलौती बेटी से शादी कर ली। अभी योगी अगले ओलंपिक की तैयारी में जुटे हैं। योगी का अगला टारगेट 2020 टोक्यो ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतना है। टोक्यो ओलंपिक योगी का आखरी ओलिंपिक होगा क्योंकि उसके बाद उन्होंने ओलिंपिक में हिस्सा लेने से मना कर दिया है।

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