पाकिस्तान के मचीनाबाद से लाई गई ईंटें अब भी मार्बल से अधिक मजबूत

Bricks brought from Machinabad in Pakistanसीमा पार पाकिस्तान के मनीचाबाद की ईटें इतनी मजबूत कि अब भी पुरानी इमारतों में मार्बल से ज्यादा मजबूत नजर आती है।

By: surender ojha

Published: 19 Mar 2020, 01:27 PM IST

श्रीगंगानगर. सीमा पार पाकिस्तान के मनीचाबाद की ईटें इतनी मजबूत कि अब भी पुरानी इमारतों में मार्बल से ज्यादा मजबूत नजर आती है। मार्बल की तरह फिशिंग देखकर लोग इन पुरानी ईंटों को खरीदने के लिए आतुर है लेकिन अब यह बीते जमाने की बात हो चुकी है।

भारत-पाकिस्तान बॉर्डर से सटे हिन्दुमलकोट की बीएसएफ चौकी से चंद कदम दूर पर पुरानी इमारतों में मचीनाबाद की ईटें लगी हुई है। देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से व्यापारिक गतिविधियां बंद हुई तो इस हिन्दुमलकोट में ईंटों की खपत भी एकाएक थम गई। अब जितने भी मकान आजादी के बाद बने है, वे आसपास ईंटों भट्टों की ईटों से बनाए गए है। लेकिन आजादी पूर्व बनी इमारतों में मचीनाबाद की ईटें अब भी पर्यटकों के लिए आकर्षक का केन्द्र बनी हुई है।

हिन्दुमलकोट में एक पुरानी इमारत के मालिक ने पत्रिका टीम को अपनी पुरानी हवेली दिखाते हुए ईटों की खूबियां गिनवाई तो उनका दावा था कि आजादी से पहले बनने वाली ईटें ज्यादातार मचीनाबाद से सप्लाई आती थी। तब बैलगाड़ी से आती थी ईटों की खेप पुरानी हवेली के मालिक चिमनलाल सेतिया का कहना है कि आजादी से पहले मचीनाबाद की ईटें अधिक विख्यात थी।

उसकी गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि हिन्दुमलकोट और कोठा आदि गांवों में हवेलियां बनाने के लिए कारीगर इसी ईटों के बारे में लाने की सिफारिश करते थे। बैलगाडिय़ो में लाद कर हिन्दुमलकोट में आपूर्ति होती थी।

तब बॉर्डर एरिया में तारबंदी नहीं थी, सडक़ और रेल सुविधा सीधी थी। एक साबुत ईंट को दिखाते हुए सेतिया का कहना था कि इस ईंट का वजन इलाके की ईटें से दुगुना है और उसकी फिशिंग मार्बल से अधिक साफ है।
इस बीच हिन्दुमलकोट के 103 वर्षीय बुजुर्ग पालासिंह का कहना है कि पाकिस्तान के मचीनाबाद, नजीमाबाद, खींचीवाला आदि से कारीगरों की टोलियां आती थी।

इन कारीगरों के हाथ में हुनर अधिक था, इस वजह से हर पक्के घर के मुख्य गेट पर अब भी डिवाइजन देखने को मिल जाएंगे। देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से कारीरगर नहीं आते है लेकिन पूर्व में उनकी बनाए गए हवेलियां और पक्के मकान या दुकान अब भी देखने लायक है।

surender ojha Reporting
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