कोरोना ने छीना आठ हजार कारीगरों का रोजगार

Corona snatched the employment of eight thousand artisans- बैग और पर्स बनाने का कारोबार एक सौ करोड़ का कारोबार, अब लोकल पर दिल्ली मेड हावी

By: surender ojha

Updated: 13 Sep 2021, 01:58 PM IST

श्रीगंगानगर. एक जमाना था जब यहां के तिरपाल के बने बैग सफर में सहयोगी बनते थे लेकिन लोकल स्तर पर बैग और पर्स बनाने की प्रक्रिया में लागत बढऩे तो कारोबारियों ने अपने हाथ खींच लिए।

अब सिर्फ दिल्ली मेड बैग और पर्स की खरीद फरोख्त से दुकानदारी चल रही है। लोकल बैग की क्वालिटी बेहतर थी। लेकिन लागत बढऩे पर यह मार्केट से आउट होने लगा है।

इसके विपरीत दिल्ली मेड बैग और पर्स का कारोबार चालीस प्रतिशत रफ्तार से बढ़ा है। वहीं लोकल स्तर पर बैग बनाने वाले कारीगरों को कोरोनाकाल झटका लगा है।

दुकानदारों की माने तो कोरोना काल में शिक्षण संस्थाएं और वैवाहिक समारोह पर प्रतिबंध लगा तो खपत एकाएक घट गई। स्कूली बैग तो बिके ही नहीं। यही स्थिति लेडिज पर्स और जेंट्स पर्स की है।

वैवाहिक कार्यक्रम में लेडिज बैग खूब बिकते है। दुकानदारों की माने तो लोकल स्तर पर बैग बनाने वाले कारीगरों को मजबूरन छुट्टी करनी पड़ी। वहीं मशीनों को बेचान कर दिया गया।

जिले में करीब आठ हजार कारीगरों से यह रोजगार छीन गया है। अब अधिकांश दुकानों पर दिल्ली मेड माल रखने लगे है। इन बैग के बेचान से दुकानदार को मुनाफा पहले जितना ही मिल रहा है।

लेडिज बैग और पीठू बैग की अधिक खरीददारी लेडिज पर्स, जेन्ट्स पर्स, ट्रेवल बैग, लेडिज पीठू बैग, स्कूल बैग का कारोबार पूरे जिले में एक सौ करोड़ रुपए का सालाना टर्नओवर है। कॉलेज और कोचिंग पढऩे वाले छात्र-छात्राएं पीठू बैग का इस्तेमाल करते है।

औसतन हर छात्रा छह माह में एक बार पीठू बैग को बदलती है। सबसे ज्यादा खपत स्कूलों की छोटी कक्षाओं में पढऩे वाले बच्चों में स्कूली बैग और पीठू बैग की रहती है।

लेडिज पर्स सबसे ज्यादा संख्या में बिकते है। दिल्ली से माल मंगवाकर छोटे छोटे कस्बों में भी यह बैग सप्लाई होता है।

लेडिज पर्स एक सौ रुपए से लेकर दो हजार रुपए तक, जेन्ट्स पर्स साठ रुपए से लेकर आठ सौ रुपए तक, पीठू बैग दो सौ रुपए से लेकर दो हजार रुपए तक, लेडिज पीठू बैग तीन सौ रुपए से लेकर एक हजार रुपए की कीमतों में बिक रहे है।

इधर, दुकानदार सुधीर कुमार भटेजा का कहना है कि कोरोना काल के कारण प्राइमरी और मिडिल स्कूल बंद पड़े है। वहीं सीनियर सैकण्डरी स्कूल और कॉलेजों में पहले जैसे रौनक नहीं है।

इसके साथ साथ वैवाहिक कार्यक्रम भी पहले की तरह बड़े स्तर पर नहीं हो रहे है। इसका असर बैग और पर्स की बिक्री पर पड़ा है। इस कोरोना के डेढ़ साल की समय अवधि में कारोबार को चौपट कर दिया है। पहले से मंगवाया हुआ मॉल अब तक नहीं बिक रहा।

इस बीचं होलेसल विक्रेता ओम प्रकाश मित्तल का कहना है कि सरकार ने इस कारोबार को स्थापित करने के लिए प्रयास ही नहीं किए। इस कारण अब तक यहां एक भी फैक्ट्री नहीं लग पाई।

वहीं केन्द्र सरकार ने भी देश में संचालित हो रही फैक्ट्रियों की सुविधाओं देने में हिम्मत नहीं दिखाई। यदि प्रयास किए होते तो दिल्ली मेड की बजाय लोकल बैग और पर्स का धंधा हमारे इलाके की पहचान बनते।

surender ojha Reporting
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