गंगानगरी पंजाबी चूड़े की धूम बरकरार

Ganganagari punjabi chooda continues- देश के अलावा कनाडा, बांग्लादेश और आस्ट्रेलिया में भी डिमांड

By: surender ojha

Updated: 10 Sep 2021, 07:49 PM IST

श्रीगंगानगर. इलाके की पहचान अब तक सिर्फ किन्नू के रूप में थी लेकिन अब सुहागिनों के प्रतीक माने जाने वाले पंजाबी चूड़े की धूम देश और विदेशों में हो गई है। राजस्थान के अलावा पड़ौसी पंजाब-हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, असम के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, कनाडा, आस्ट्रेलिया में भी गंगानगरी पंजाबी चूड़े की डिमांड बढ़ी है।

जिला मुख्यालय से इन चूड़ों के बनाने का काम व्यापक रूप से हो रहा है। यहां से दिल्ली और महाराष्ट्र काफी तादाद में चूड़े की सप्लाई होती है। वहां से विदेशों के लिए इस चूड़े का निर्यात किया जाता है। कोरोनाकाल में हर व्यापार में एकाएक कमी आई लेकिन चूड़े की बिक्री पर असर नहीं पड़ा।

आपूर्ति करने में देर जरूर हुई लेकिन बिक्री पहले की तरह बरकरार रही। शादियों और त्यौहारी सीजन में इस चूड़े की अधिक डिमांड बढ़ जाती है। इस कारण व्यापारी अनुमानित खपत के अनुरुप चूड़े को तैयार करवाते है।

महज साठ रुपए से लेकर दो हजार रुपए प्रति चूड़े की कीमत तय है। इस कारोबार से इलाके के करीब आठ हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

पंजाबी परिवारों में विवाह के दौरान दूल्हन के हाथों में पंजाबी चूड़ा पहनाया जाता है। करोड़पति हो या जरूरतमंद परिवार, सब की शादी में इस चूड़े को पहनना जरूरी है। पंजाबी बाहुल्य इस क्षेत्र में सुहागिन महिलाएं विवाह के अलावा पति की दीघार्य वाले व्रत जैसे करवा चौथ पर चूड़े को पहनती है।

पंजाबी परिवार देश में जहां जहां गए वहां से गंगानगरी पंजाबी चूड़े की मांग करने लगे। इसकी डिमांड दिनोंदिन बढ़ गई है। पंजाबी परिवार देश के किसी भी क्षेत्र में हो, इस चूड़े की जरुरत विवाह में अनिवार्य है।

इस चूड़े पर अलग अलग मोती और फैंसी आइटम चिपकाने के लिए कोमल हाथों की जरूरत रहती है। इस कारण महिलाएं भी इस चूड़े को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चक ३ ई छोटी और पुरानी आबादी के कई घरों में इस चूड़े को तैयार करवाने के लिए महिलाएं अपने परिवार सहित काम करती है।

थोक व्यापारी इन चूड़ों पर अलग अलग डिजाइन का सामान देते है। चूड़े तैयार करवाने के एवज में दिहाड़ी चार सौ से लेकर छह सौ रुपए रोजाना मिलती है। कोरोना काल में इस कारोबार से जुड़ी महिलाएं और पुरुषों ने चूड़े बनाने का काम भरपूर किया है। व्यापारी रूपेश अरोड़ा ने बताया कि पिछले महज ढाई दशक में ही इस कारोबार ने अपनी पहचान बना ली है।

व्यापारियों की माने तो यह चूड़ा पहले अमृतसर में बनता था। लेकिन अब यहां चूड़े का कारोबार इतना तेजी से बढ़ा कि यह गंगानगरी पंजाबी चूड़ा हो गया। इस पंजाबी चूड़े के अलावा रेजवाड़ी चूड़ा भी बनने लगा है। वहीं युवाओ के लिए फैशननेबल की आइटम भी बनाई जा रही है।

दूल्हा-दूल्हन की फोटो और नाम वाले चूड़े भी आकर्षक बनने लगे है। दुकानदारों ने बताया कि बदलते परिवेश में अब शॉर्ट चूड़े की डिमांड भी बढ़ी है। पहले बड़े चूड़े पूरे हाथों में पहनने पड़ते थे लेकिन अब कंगन का रूप देते हुए इसे शॉर्ट कर दिया गया है। फैंसी डिब्बे में ये चूड़े आकर्षक का केन्द्र बने हुए है।

संयुक्त व्यापार मंडल के अध्यक्ष तरसेम गुप्ता ने बताया कि विदेशों में खासतौर पर पंजाबी बाहुल्य क्षेत्र वाले कनाडा के अलावा बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया और अमेरिका में गंगानगरी पंजाबी चूड़े की डिमांड अधिक है।

लेकिन सीधा व्यापार नहीं होने के कारण दिल्ली और महाराष्ट्र से विदेशों के लिए निर्यात होता है। दिल्ली और महाराष्ट्र के व्यापारी यहां से थोक में माल खरीदते है। सरकार अपने स्तर पर हवाई सेवा जैसी सेवाएं शुरू कर दे तो विदेशों से आने वाले व्यापारी यहां से माल लेकर जाएंगे।

व्यापारी राकेश शर्मा ने बताया कि चूड़े कारोबार में बड़े पैमाने पर निवेश या बड़ा कारखाना शुरू हो जाएं तो इलाके की कायाकल्प हो सकती है। वहीं सरकार इस कारोबार को बढ़ावा देने के लिए ऋण जैसी सुविधाएं भी शुरू कर दे तो यह इलाका चूड़े में हब बन सकता है।

surender ojha Reporting
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