कोरोना के असर से 92 साल में पहली बार ससुराल नहीं गई गणगौर

Gangaur did not leave her in-laws for the first time in 92 yearsदेश व्यापी लॉक डाउन का असर इतना अधिक था कि इलाके की सबसे पुरानी दादी बामणी की गणगौर की शोभा यात्रा निकाली नहीं गई।

By: surender ojha

Updated: 27 Mar 2020, 09:22 PM IST

श्रीगंगानगर. महाशिव के अवतार के रूप में ईसर-गणगौर की पूजा युवतियों और महिलाओं में अधिक महत्व रखती है। लेकिन इस बार कोरोना वायरस संक्रमण के लिए देश व्यापी लॉक डाउन का असर इतना अधिक था कि गणगौर का त्यौहार शुक्रवार को घरों तक सीमित रहा।

इलाके की सबसे पुरानी गणगौर दादी बामणी की है, इस गणगौर को बकायदा नई ड्रेस से तैयार भी किया गया लेकिन ससुराल रूपी उत्सव नहीं होने के कारण गणगौर की शोभा यात्रा निकाली नहीं गई। ईसर और गणगौर दोनों को शुक्रवार को सुबह तैयार किया गया। गणगौर ने तो कई श्रृंगार भी किए। लंहगा चुन्नी की ड्रेस आकर्षण का केन्द्र रही। हालांकि परिवार की दो तीन महिलाओं ने संक्रणरोधी दवा छिडक़ाते हुए इस गणगौर का पूजन किया। जवाहरनगर सैक्टर सात स्थित दादी बामणी के आवास पर उनके पुत्र वधू सीमा और संतोष शर्मा ने घर पर ही पूजन कर यह प्रक्रिया अपनाई।

दादी बामणी के पुत्र श्यामलाल शर्मा बताते है कि गणगोर के इतिहास में पहली बार ऐसा वाक्या हुआ है कि जब गणगौर अपने ससुराल जाने के लिए शोभा यात्रा में नहीं जा पाई। कोरोना वायरस संक्रमण के कारण इलाके में लॉक डाउन की वजह से महिलाएं भी गौर पूजन करने के लिए नहीं आ सकी।
बीकानेर रियासतकाल में दादी बामणी के नाम से पंडित गंगाप्रसाद शर्मा और उनकी पत्नी आशा ने इस गणगौर को पूजने की प्रक्रिया शुरू की थी। महाराजा गंगासिंह के चूनागढ़ में गणगौर अपने ससुराल रूपी उत्सव में वहां पहुंची तो महिलाएं मंगलगान से उसका स्वागत करती।

वर्ष 1976 में शर्मा परिवार श्रीगंगानगर आया तो यहां यह परपंरा शुरू हो गई। आशा देवी दादी बामणी के नाम से अधिक विख्यात थी, उनकी गणगौर रस्म से इलाके की महिलाओं का जुड़ाव इतना अधिक हुआ कि अब तक यह परिवार गणगौर को साल भर अपने पास रखते है। गणगौर मेले में इसकी शोभा यात्रा निकालते है।

संतोष शर्मा ने बताया कि होली त्यौहार पर गणगौर का पूजन शुरू हो जाता है। होलिका दहन के बाद बची राख की पिङ्क्षडयां बनाई जाती है। शीतला सतप्मी तक गणगौर बांध की तैयार की जाती है। गणगौर का श्रृंगार श्रद्धालु लाकर करते है।

गणगौर उत्सव के दिन गणगौर पूजन सुबह होता है और शाम के समय उत्सव मनाया जाता है। महावीर दल मंदिर प्रागंण में जब पुराना कुंआ था, तब यह गणगौर वहां भिजवाई जाती थी। वहां विशेष पूजन के बाद वापस घर लाया जाता था।

surender ojha Reporting
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