पेंसिल स्कैच का 'राजाÓ बनना चाहता है राजाराम

साधुसिंह लहरी. श्रीगंगानगर.

कहा जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है। वह बिना बोले बहुत कुछ कह जाता है। अगर इसी चित्र में किसी के हाथों की अंगुलियों की कारीगरी छुपी हो तो बात कुछ खास हो जाती है। हालांकि, वर्तमान परिवेश में 'चित्रोंÓ के भरोसे रोजी-रोटी का जुगाड़ एक स्वप्न के समान है। इसके बावजूद घड़साना क्षेत्र के चक 21 एएस 'बीÓ निवासी युवा राजाराम बावरी का चित्र बनाने के प्रति लगाव देखते ही बनता है

By: sadhu singh

Published: 14 Oct 2021, 02:45 AM IST

साधुसिंह लहरी. श्रीगंगानगर. कहा जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है। वह बिना बोले बहुत कुछ कह जाता है। अगर इसी चित्र में किसी के हाथों की अंगुलियों की कारीगरी छुपी हो तो बात कुछ खास हो जाती है। हालांकि, वर्तमान परिवेश में 'चित्रोंÓ के भरोसे रोजी-रोटी का जुगाड़ एक स्वप्न के समान है। इसके बावजूद घड़साना क्षेत्र के चक 21 एएस 'बीÓ निवासी युवा राजाराम बावरी का चित्र बनाने के प्रति लगाव देखते ही बनता है।
राजाराम को चित्र उकेरने का शौक बचपन से ही था। हालांकि उसके घर की परिस्थिति और आसपास का वातावरण ऐसा नहीं था कि वह चित्रकारी के लिए वक्त निकाल पाता। यही कारण था कि अन्य बच्चों की तरह उसने भी स्नातक हिंदी, राजनीतिक विज्ञान व भूगोल विषय से की। अब वह भूगोल में एमए कर रहा है।
राजाराम के अनुसार यू-ट्यूब, ट्विटर, फैसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म देखने के बाद चार वर्ष पहले महसूस किया कि उसे अपने बचपन के 'प्यारÓ यानी चित्रकारी को फिर से जीना चाहिए। कॉलेज पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अध्ययन के साथ-साथ पोट्रेट स्कैच में अंगुलियां घुमाना शुरू किया। सोशल मीडिया से ही अपनी ग्रेफाइट/चारकोल पेंसिल को धार दी। हरियाणा के चित्रकार सौरभ जोशी को आदर्श मानने वाला यह युवा पढ़ाई के बाद खाली समय में से कुछ वक्त निकालकर कागज पर पेंसिल से चित्र उकेरने में ही मशगूल रहता है।
घर के काम में हाथ बंटाता है..
राजाराम एक सामान्य परिवार से संबंध रखता है। उसके पिता लक्ष्मणराम बावरी खेतीबाड़ी करते हैं। मां को कैंसर है, इसलिए उसे घर के काम में भी हाथ बंटाना पड़ता है। एक भाई है। वहीं बहन शादीशुदा है। इस युवा का कहना है कि एक मैकेनिक पेंसिल 150-650 रुपए तक की मिलती है। वहीं, ए-2 से ए-4 कागज, स्कैल, ब्रुश आदि पर भी काफी खर्च आ जाता है।
अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना चाहता राजाराम
यह युवा जानता है कि चित्रकरी को ग्रामीण परिवेश में रोजगार का साधन नहीं बनाया जा सकता। लेकिन, वह इसी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना चाहता है। अब तक उसके बनाए श्रीगुरुनानक देव व गौसाई जी के बनाए चित्र सराहे गए हैं। वह देश के शहीदों और महान हस्तियों के पैंसिल स्कैच बनाना चाहता है ताकि युवा उनके आदर्शों को अपना सकें।

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