इलाके में गन्ने का उत्पादन फिर गुड़ के लिए बाहरी राज्यों पर निर्भर

Sugarcane production in the area again dependent on outside states for jaggery- श्रीगंगानगर जिले में रोजाना साढ़े तीन हजार क्विंटल गुड़ की खपत

By: surender ojha

Published: 04 Oct 2021, 10:46 PM IST

श्रीगंगानगर. इलाके में गन्ने का उत्पाद होता है। इस उत्पादन को देखते हुए सत्तर साल पहले शुगर मिल को स्थापित किया गया था।

गन्ना उत्पादन होने के बावजूद जिले में गुड़ बनाने का धंधा नहीं बन पाया। इस कारण पूरे जिले में बाहरी राÓयों से गुड़ की सप्लाई होती है। रोजाना जिले में साढ़े तीन हजार क्विंटल की खपत हो रही है।

व्यापारियों की माने तो गुड़ की अलग अलग क्वालिटी इसी इलाके में तैयार होती तो श्रीगंगानगर गुड़ के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान होती। इलाके में Óयादातर गुड़ शिवलिंग जिसे आम भाषा शिव पेड़ी भी कहा जाता है, यह चाय बनाने के लिए अधिक इस्तेमाल होता है।

इसी तरह लड्डू गुड़ खाने के काम आता है। वहीं केशर गुड़ यह ज्यादातर लोग हथकढ़ और देसी मदिरा बनाने के काम आता है। गुड़ का नया उत्पाद नवरात्रे के दौरान या दशहरे के आसपास आता है।

ग्रामीण एरिया में गुड़ की चाय का प्रचलन अब तक बरकरार है। वहीं पशुओं के खिलाने से दूध का उत्पादन अधिक होता है।

इस बीच, गुड़-चीनी एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष कालीचरण अग्रवाल का कहना है कि इलाके में लोकल गुड़ निकालने के लिए दीपावली के आसपास कई जगह गुड़ निकालने के लिए भट्टियां लगती है।

लेकिन इनकी मात्रा काफी कम होने के कारण उतना गुड़ का उत्पादन नहीं होता जितनी बाजार में डिमांड रहती है।यह सही है कि गन्ने का उत्पाद होने के बावजूद हमारा जिला गुड़ उत्पादन में पिछड़ा हुआ है।

गुड़ की नई नई वैरायटियां आ रही है, इस कारण ग्राहक की पसंद और डिमांड को देखते हुए गुड़ बाहर से मंगवाना पड़ता है। इधर, थोक विक्रेता कमल मिड्ढा का मानना है कि शहरी की बजाय ग्रामीण एरिया में गुड़ की अधिक डिमांड रहती है।

गौशालाओं में गौवंश को गुड़ खिलाने का चलन अधिक बढ़ा है, इस कारण भी गुड़ की खपत अधिक होने लगी है। आयुर्वेदिक पद्वति में गुड़ का सेवन सर्वोत्तम माना गया है।

इस कारण गुड़ खाने के शौकीनों की संख्या भी कम नहीं है। चीनी में एकाएक दाम बढऩे का असर गुड़ भी पर होने लगा है। नया गुड़ मार्केट में आने लगा है। दशहरे के आसपास नया गुड़ का सीजन होता है।

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