यह कैसा शिक्षक दिवस, दूध और पोषाहार बनाने के कार्यो में उलझे शिक्षक

How was this teacher's dayसरकारी स्कूलों के शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्य के कारण स्कूल का अनुशासन अधिक प्रभावित हुआ है.

 

By: surender ojha

Published: 05 Sep 2019, 12:19 AM IST

.श्रीगंगानगर। बदलते परिवेश में शिक्षक के लिए अब किताबी ज्ञान के साथ साथ समग्र शिक्षा देने की चुनौतियां है। अब वह जमाना गया जब शिक्षक ही गूगल माना जाता था लेकिन अब बच्चे होमवर्क कर सवाल पूछते है। ऐसे में शिक्षक को भी अपडेट होने की जरुरत है।

सरकारी स्कूलों में ज्यादातर विद्यार्थी जरुरतमंद परिवारों से आते है, उनके अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भिजवाने तक सीमित है लेकिन नियमित अध्यापन पर फोकस नहीं रख पाते। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्य के कारण स्कूल का अनुशासन अधिक प्रभावित हुआ है। बीएलओ बनकर डयूटियां देना, स्कूल में पढ़ाई से ज्यादा दूध और मिड डे मिल की व्यवस्थाओं की उलझन आए दिन देखने को मिलती है। शिक्षक दिवस पर चुनिंदा शिक्षकों से बात की तो कई बातें सामने आई। कई शिक्षकों का कहना था कि अब भय दिखाकर पढ़ाई नहीं करवाई जा सकती, ऐसे में मित्रवत बनकर विद्यार्थी में पढ़ाई या खेल या अन्य गतिविधियों की खामियों को दूर करने का प्रयास किया जा सकता है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे है।
इस बीच बींझबायला के सरस्वती देवी मंडा राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाचार्य नीतू शर्मा का कहना है कि गुरु-शिष्य की सार्थकता को बनाए रखना वर्तमान शिक्षा जगत में सबसे बड़ी चुनौती है। आजकल विद्यार्थियों में मानसिक बल का अभाव देखा जा रहा है, नंबर गेम में उलझ कर आत्महत्या के प्रकरण सामने आना शिक्षा की सार्थकता पर ही सवाल उठाता है।

एक शिक्षक के रूप में विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक विकास करने की जिम्मेदारी निभाना गुरुत्तर कार्य है।
स्कूलों में बढ़ी बालिकाओं की संख्या वाणिज्य संकाय में छात्राओं की प्रतिभाओं में निखाने में लगी सरकारी स्कूल की व्याख्याता अनुराधा गर्ग का कहना है कि सरकारी स्कूलों में ग्रामीण परिवेश से बच्चे आते है। सरकार की ओर से चलाए गए अभियान का यह परिणाम आया है कि अब सरकारी स्कूलों में बालिकाओं की संख्या में एकाएक बढोत्तरी हुई है। मित्रवत बनकर ऐसे विद्यार्थियों को पढ़ाना चुनौती है। आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों में बच्चों में प्रतिभाओं को निखाने के बाद ही माध्यमिक स्तर बोर्ड की कठिन परीक्षाओं में बेटियों ने अपना परचम लहराया है।
राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय मटका चौक की व्याख्याता भावना मानते है कि सरकारी स्कूलों के परिणाम में विद्यार्थियों के साथ साथ अभिभावकों की भूमिका भी रहती है। प्राइवेट स्कूलों में अध्ययरत विद्यार्थियों के अभिभावक ज्यादा सक्रिय और गंभीरता से लेते है, ऐसे में स्कूलों का परिणाम सकारात्मक रहता है जबकि सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के अभिभावक इतने सक्रिय नहीं है जितनी अपेक्षा रहती है। यदि अभिभावक सक्रिय और गंभीर हो जाएं तो पचास प्रतिशत सिस्टम सुधार जाएगा।
सूरतगढ़ क्षेत्र गांव सिंगरासर स्थित राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्राध्यापक डा.ऩीता अग्रवाल की माने तो एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके सामने उसका फर्ज है। जमीर कहता हैं अच्छी तालीम बच्चों को दी जाए, लेकिन वर्तमान में उसका ज़मीर हार गया है और अन्य कार्यालय उत्तरदायित्व करने आवश्यक हो गए है। बच्चे अनुशासन और अपने परिवेश से दूर होते जा रहे हैं, उसमें सामंजस्य आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

surender ojha Reporting
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