नाम किसानों का, भला बड़ी पूंजी वालों का

केंद्र सरकार के तीन कृषि अध्यादेशों पर बवाल: -किसानों का तर्क है कि किसान पहले ही उपज के उचित मूल्य से वंचित है, जबकि अब कानूनों का सहारा लेकर उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को ठगने की तैयारी है।

By: Krishan chauhan

Published: 01 Dec 2020, 10:23 AM IST

केंद्र सरकार के तीन कृषि अध्यादेशों पर बवाल: नाम किसानों का, भला बड़ी पूंजी वालों का

-किसानों का तर्क है कि किसान पहले ही उपज के उचित मूल्य से वंचित है, जबकि अब कानूनों का सहारा लेकर उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को ठगने की तैयारी है।

श्रीगंगानगर. केंद्र सरकार खेती, कृषि जिन्सों व व्यापार से जुड़े तीन अध्यादेश 5 जून को लेकर आई थीं। इनके खिलाफ देश भर में अब कडक़ड़ाती सर्दी में किसान, मजदूर व व्यापारी सडक़ों पर है। इन बिलों को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है। किसानों का तर्क है कि कृषि जिन्सों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की अनिवार्यता का बिल लेकर आए तथा तीनों अध्यादेश वापस लिए जाए। इन मांगों को लेकर किसान धरना, प्रदर्शन व दिल्ली की बाहरी सडक़ों को जाम कर आंदोलन कर रहा है। जबकि भाजपा का कहना है कि यह तीनों बिल किसान, मजदूर व व्यापारी के हित में सरकार लेकर आई है। इनसे मंडियों में बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाएगी और किसान सीधा व्यापारी को अपनी कृषि जिन्सों का बेचान कर पाएगा। जबकि किसानों का कहना है कि यह तीनों अध्यादेश किसान को बर्बाद करने वाले हैं। इनको किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जाएगा।
यह है तीन अध्यादेश

अध्यादेश नंबर-1. किसान उपज, व्यापार एवं वाणिज्य संवर्धन एवं सुविधा
अध्यादेश नंबर-2. अनिवार्य वस्तु अधिनियम 1955 संशोधन

अध्यादेश नंबर-3. मूल्य असाधन व कृषि सेवाओं पर किसान संरक्षण समझौता
इनका अपना-अपना तर्क

यह तीनों बिल व्यापारी, मजदूर व किसान विरोधी है। बड़ी कार्पोरेट घराने पैन कार्ड पर मंडी से बाहर सीधा किसान से माल खरीद करेगा। इसमें व्यापारी की कोई भूमिका नहीं होगी। इससे व्यापारी व मंडी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। मंडी में काम करने वाला धानक, तोला व अन्य श्रमिकों का रोजगार छीन जाएगा। मंडी के माध्यम से किसान और व्यापारी के बीच विश्वास की एक कड़ी बनी हुई है। यह विश्वास किसान का बड़े कार्पोरेट घरानों पर नहीं है। मंडी में टैक्स और बाहर कोई टैक्स नहीं, इससे छोटा व्यापारी खत्म हो जाएगा और बड़ा कार्पोरेट घराना अपनी मनमानी करेगा। इस पर किसी का कोई नियंत्रण भी नहीं रहेगा।
धर्मवीर डूडेजा, अध्यक्ष, दी गंगानगर ट्रेडर्स एसोसिएशन,श्रीगंगानगर

किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य बिल में धान मंडियां समाप्त हो जाएगी। किसान को अपनी उपज की ब्रिकी करने के लिए एक प्लेटफॉर्म जो मिल रहा था वह नहीं मिल पाएगा। यहां पर बोली से किसान की उपज की ब्रिकी होती है। सीधी खरीद में उपज का पूरा मूल्य किसान को नहीं मिल पाएगा। किसान को उपज का सही मूल्य नहीं मिलने पर एसडीएम और कलक्टर के पास अपील कर सकेंगे। न्यायालय जाने का रास्ता बंद हो जाएगा तथा किसान की उपज बेचान के बाद पैसा डूबने पर सुनवाई नहीं होने की आंशका बनी रहेगी।
संतवीर सिंह, प्रवक्ता, ग्रामीण किसान मजदूर समिति,श्रीगंगानगर।

अनिवार्य वस्तु अधिनियम 1955 संशोधन में स्टॉक लिमिट खत्म होने से बड़े कारोबारी किसी भी कृषि जिन्सों की बड़ी मात्रा में भंडारण कर लेंगे। इसके बाद इन वस्तुओं को महंगे दामों पर इनका बेचान करेंगे। इससे महंगाई बढ़ेगी और कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा। किसानों का भी शोषण होगा। इसका लाभ बड़े कार्पोरेट घरानों को होगा। इसलिए इसका व्यापारी व किसान विरोध कर रहे हैं। किसान की उपज एमएसपी से नीचे नहीं बिकने की गारंटी देनी होगी।
कालू थोरी, जिलाध्यक्ष, अखिल भारतीय किसान सभा, श्रीगंगानगर।

इनकी क्या है मंशा
प्रगतिशील किसान व एडवोकेट मनीराम पूनिया का कहना है कि मंशा कृषि उपज व्यापार हथियानें की है, ताकि मांग-आपूर्ति का विश्लेषण कर गुणवत्ता मानकों के अनुसार ऑनलाइन कृषि उपजें खरीद कर सकें, उनका भंडारण कर सकें, प्रसंस्करण उद्योगों में उत्पाद तैयार कर सकें और क्रय-विक्रय की श्रृंखला बनाकर उन उत्पादकों को बाजार में अधिक लाभ कमाने के आधार पर बेच सकें। इस तरह से आयात-निर्यात के आधार पर कृषि जिन्सों के दाम घटाने, बढ़ाने का रूख अपनाएंगे तथा उत्पादकों को कम दाम चुकाकर उपभोक्ताओं से अधिक मूल्य वसूली करेंगे।

व्यापारी पर क्या प्रभाव पड़ेगा

मंडी में टैक्स और मंडी के बाहर बिना टैक्स पैन कार्ड के आधार पर कृषि जिन्सों की खरीद होगी। मंडी में काम-काज बंद होने पर छोटे व्यापारी खत्म हो जाएंगे। व्यापारी, मजूदर, मुनीम, पल्लेदार व धानक बेरोजगार हो जाएगा।
यह भी पड़ेगा प्रभाव

-किसान को उपज का सही मूल्य नहीं मिला तो किसान न्यायालय भी नहीं जा पाएगा।
-स्टॉक लिमिट नहीं होने से जमाखोरी बढ़ जाएगी।

-छोटे व्यापारियों का व्यापार समाप्त हो जाएगा।
- संविधा खेती करने पर कंपनियों की मनमानी बढ़ जाएगी।

फैक्ट फाइल-
श्रीगंगानगर जिले का गणित

-किसान व खेतीहर मजदूर-5 लाख
-व्यापारी, मुनीम,पल्लेदार व धानक -1 लाख

Krishan chauhan Reporting
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