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केन्द्र व राज्य सरकार के दो अभियानों को एक साथ पलीता

केन्द्र व राज्य सरकारें आबादी को नियंत्रित रखने के लिए परिवार कल्याण कार्यक्रम पर करोड़ों रुपए बहाती है। इसी तरह साक्षरता कार्यक्रम पर भी बड़ी धनराशि खर्च करती है परन्तु निचले तबके के लोग इन कार्यक्रमों से आज भी अछूते हैं। राज्य के प्रत्येक शहर में सैकड़ों झुग्गी झोपडिय़ां है। श्रीगंगानगर शहर भी इससे अछूता नहीं है। खानाबदोश परिवार को जहां भी खाली जगह मिली उन्होंने झोपड़ी डाल ली। इन झोपडिय़ों में रहने वाले बालिग तो निरक्षर हैं ही इनके बच्चे भी
अनपढ़ हैं।

श्री गंगानगर

Published: December 31, 2021 01:29:15 am

-झुग्गी झोपडिय़ों में रहने वाले परिवारों में 6 से 10 बच्चे
-शत-प्रतिशत बच्चे और उनके परिजन निरक्षर
योगेश तिवाड़ी.श्रीगंगानगर. केन्द्र व राज्य सरकारें आबादी को नियंत्रित रखने के लिए परिवार कल्याण कार्यक्रम पर करोड़ों रुपए बहाती है। इसी तरह साक्षरता कार्यक्रम पर भी बड़ी धनराशि खर्च करती है परन्तु निचले तबके के लोग इन कार्यक्रमों से आज भी अछूते हैं।
राज्य के प्रत्येक शहर में सैकड़ों झुग्गी झोपडिय़ां है। श्रीगंगानगर शहर भी इससे अछूता नहीं है। खानाबदोश परिवार को जहां भी खाली जगह मिली उन्होंने झोपड़ी डाल ली। इन झोपडिय़ों में रहने वाले बालिग तो निरक्षर हैं ही इनके बच्चे भी अनपढ़ हैं। ये परिवार चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के ‘हम दो हमारे दो’ नारे को ये लोग धत्ता बता रहे हैं। इनमें कोई भी ऐसा परिवार नहीं है जिसमें 5-6 से कम बच्चे हो। व्यस्क कबाड़ बीनने या ढोलक आदि बजाने का काम करते हैं तो बच्चे घर-घर जाकर भीख मांगते हैं।
जिला साक्षरता एवं सतत साक्षरता विभाग ने निरक्षर लोगों को साक्षर करने के लिए ग्राम पंचायतों में प्रेरकों को जिम्मा दे रखा था परन्तु अगस्त 2018 में सरकार ने उन्हें विदा कर दिया। अब ग्राम पंचायत स्तर पर यह काम पीइइओ को सौंप रखा है परन्तु शहर में कोई धणी धोरी नहीं। अशिक्षा के कारण इन परिवारों के व्यस्क लोग दिनभर में जो कमाई करते हैं वे शराब आदि के नशे में उड़ा देते हैं।
होशियारपुर(पंजाब) के चक्रोता गांव से हाल ही आए एक परिवार में छह बच्चे हैं। इस परिवार ने शहर की पत्रकार कॉलोनी के पास खाली पड़ी जमीन पर झोपड़ी डाली है। परिवार का मुखिया राजेश(38) अनपढ़ है। वह जड़ीबूटी से दवाई बनाकर बेचने का काम करता है। उसके परिवार में पत्नी राखी (35), इस दंपती के मनीषा (14), अरमान (8),आकाश (5), सोनाक्षी(4),नन्नी (3) और रामा (छह महीने) बच्चे हैं।
राजेश दिन उगते ही गली-गली जड़ी बूटी बेचने निकल जाता है वहीं बच्चे मांगने। बच्चों की मां झोपड़ी की रखवाली रखती है। यह दंपती भी निरक्षर है। इनके बच्चे अभी किसी स्कूल या आंगनबाड़ी से नहीं जुड़े हैं। राजेश के परिजन मूल रूप से बीकानेर (राजस्थान) जिले के निवासी हैं। उसके दादा-पड़दादा भी जड़ीबूटी व तेल आदि बेचने का काम करते थे।
राजेश का कहना है कि उसका भी मन होता है कि बच्चों को पढ़ाया जाए परन्तु पेट भरने के लिए पुश्तैनी काम करता है। आधार कार्ड अभी सिर्फ उसी का बना है। सरकार के किसी अधिकारी-कर्मचारी ने उनसे सम्पर्क नहीं किया न ही किसी तरह की सहायता दी। कमोबेश यही स्थिति शहर की झुग्गी झोपडिय़ों में रहने वाले अन्य परिवारों की है।
केन्द्र व राज्य सरकार के दो अभियानों को एक साथ पलीता
केन्द्र व राज्य सरकार के दो अभियानों को एक साथ पलीता
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निरक्षरों को साक्षर करने का जिम्मा ग्राम पंचायत स्तर पर पीइइओ को सौंपा जा चुका है। कुल 320 में से 260 ग्राम पंचायतों में सामान भी पीइइओ को हैंडओवर किया जा चुका है। शहर के लिए उनके पास कोई दिशा-निर्देश नहीं है।
-विजय शर्मा, जिला साक्षरता एवं सतत शिक्षा अधिकारी, श्रीगंगानगर
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चिकित्सा विभाग की एएनएम व आशा सहयोगिनियां संबंधित वार्ड में सर्वे आदि कर ऐसे परिवारों के आंकड़े जुटाती है। दंपतियों को अधिक बच्चे पैदा नहीं करने के लिए समझाइश की जाती है। किसी को भी नसबंदी ऑपरेशन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
-डॉ.गिरधारीलाल मेहरड़ा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, श्रीगंगानगर

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