श्रीगंगानगर जिले में श्रमिकों का मनरेगा से मोहभंग

Workers disillusioned with MNREGA in Sriganganagar district- तीन माह पहले थे सवा लाख श्रमिक, अब महज 31 हजार पर पहुंचा आंकड़ा.

By: surender ojha

Published: 16 Apr 2021, 12:13 PM IST

श्रीगंगानगर. पिछले साल कोरोना के प्रथम चरण में मनरेगा ही मजदूरों के लिए सहारा बना था, यहां तक कि करीब तीन माह पहले पूरे जिले में सवा लाख मनरेगा श्रमिकों की संख्या पहुंच गई लेकिन पिछले करीब एक माह से श्रमिकों का मनरेगा से मोहभंग हो गया है।

फसलों की कटाई का सीजन जैसे ही शुरू हुआ है तो मनरेगा स्थलों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्र में अधिकांश मजदूरों फसल कटाई में लग गए है। वहां दिहाड़ी करीब पांच सौ रुपए होने के कारण मनरेगा कायोज़् से गैर हाजिर हो रहे है। इस कारण मस्टरोल तो जारी हो रहे है लेकिन वहां मजदूर दिखाई नहीं देता।

सरकार ने लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए महात्मा गांधी नरेगा योजना की शुरुआत कर रखी है,इसके बावजूद जिले की विभिन्न पंचायत समितियों की ग्राम पंचायतों में मनरेगा कायोज़् से श्रमिकों ने दूरी बनाई हुई है।

दूरी इसलिए कि मौजूदा समय सरसों और गेहूं की कटाई का सीजन चल रहा है। जिले में मनरेगा के आंकड़ों पर नजर डालें तो कायोज़् की गति बड़े ही धीमे स्तर पर देखी जा रही है। हालांकि कायज़् बंद नहीं हुए है। लेकिन बंद जैसे हालात है।
जिले की कुल 345 ग्राम पंचायतों में से 336 ग्राम पंचायतों में मनरेगा कायज़् चल रहा है। मनरेगा में कायज़् के लिए मस्टरोल तो जारी कराए जा रहे हैं, लेकिन श्रमिक काम करने में रूचि नहीं दिखा रहे है। फसल की कटाई के समय में जिले के हर ब्लॉक में श्रमिकों की संख्या में कमी आई है।

इन दिनों खेतों में फसल की कटाई का समय आते ही ग्रामीण अपनी फसल काटने में जुट गए है। जिससे मनरेगा में श्रमिकों की संख्या में कमी देखने को मिल रही है।

साल मे दो बार खरीफ और रबी की फसल की कटाई के समय मनरेगा से श्रमिकों का मोह भंग हो जाता है। रबी की फसल के समय मनरेगा में श्रमिकों की संख्या ज्यादा कम हो जाती है।

सरसों और गेहूं की फसल कटने के बाद आधे से अधिक किसान और अन्य श्रमिकों के पास कोई कायज़् नहीं होता है। ऐसे में मनरेगा कायोज़् में श्रमिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। अधिकतर गमीज़् के दिनों में मनरेगा में श्रमिकों की संख्या अधिक रहती है।

मनरेगा में एक श्रमिक को मजदूरी के 220 रुपए मिलते है। जबकि फसल कटाई में 300 से 500 रुपए की दिहाड़ी मिल जाती है। वहीं कई श्रमिकों को खाने के लिए गेहूं का जुगाड़ भी हो जाता है।

श्रमिकों ने बताया कि मनरेगा के तहत काम तो मिलते हैं लेकिन समय पर भुगतान में एक सप्ताह का समय लग जाता है। कई बार बजट नहीं होने पर अधिक दिन भी हो जाते है। खेतों में जो काम अब मिला है उसमें शाम होते ही किसान हमें मनरेगा से अधिक की मजदूरी दे देते हैं।

वहीं कई लोगों के पंचायतों में आधार लिंक नहीं होने से उनका भुगतान अटका हुआ है।

इन दिनों खेतों में खड़ी गेहूं कीफसल पक कर तैयार हो गई है। सरसों की कटाई चल रही है। मौसम में हो रहे एकाएक बदलाव के कारण किसान अपनी फसल को जल्दी से कटाई कर सीधा घर और वहां से बाजार में बेचने के लिए आतुर रहता है।

पिछले साल कोरोना के कारण मजदूर नहीं मिलने से कई खेत मालिकों और ठेकेदारों ने अपने खेत पड़ौसियों की मदद करने फसल कटवाई कराई थी। अब भी बार बार मौसम में हो रहे परिवतज़्न के कारण खेतों में मजदूरों को बुलाकर फसल कटाने का दौर अंतिम चरण में चल रहा है।

मनरेगा श्रमिकों का गणित

पंचायत समिति ग्राम पंचायत श्रमिकों की संख्या

श्रीगंगानगर 52 6611

घड़साना 35 4539

सूरतगढ़ 44 4332

अनूपगढ़ 32 4106

पदमपुर 36 3916

श्रीकरणपुर 35 2471

रायसिंहनगर 45 2360

सादुलशहर 28 1556

श्रीविजयनगर29 1341

कुल योग 336 31232

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