खानाबदोश

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खानाबदोश

बड़े भैया के घर आती थी, बालकनी में खड़ी समंदर की ओर घंटों देखती रहती। विवाह और बेटी बेबी के जन्म के बाद भी उसका यहां आने पर यह सिलसिला जारी था...

घर की बालकनी से दिखाई देता संमदर का खूबसूरत दृश्य। किनारे के पार जाने का सामथ्र्य होने के बावजूद हर बार समंदर की ओर लौटती, मचलती उछलती किनारे से टकराती लहरें। दूर तक फैले समंदर के दृश्य को जीवंत करतेे जहाज, नावें और डैने फैलाए उड़ते पक्षियों की आवाज। किनारे पर समंदर में वापिस जाने के लिए छटपटाते लहरों के साथ आए छोटे जीव।


ऐसी ही छटपटाहट उसकी जिंदगी में भी थी। उसकी जिंदगी में एक अजीब सा अकेलापन और अधूरापन आ गया था। उसे अपने पति अमर से अलग रहने का दर्द तो था ही, साथ में जिंदगी से कुछ शिकायतें भी थीं और कहीं किसी टूटने की आह भी थी। इसके लिए वह खुद जिम्मेदार थी। 


जब भी वह यहां अपने बड़े भैया के घर आती थी, अक्सर बालकनी में खड़ी समंदर की ओर घंटों देखती रहती। विवाह के बाद और बेटी बेबी के जन्म के बाद भी उसका यहां आने पर यह सिलसिला जारी था। 


इस बार उसका यहां मन नहीं लग रहा था। कुछ ही दिन हुए थे इसको यहां आए। वह बालकनी में खड़ी यह सोच कर परेशान हो उठी कि उसकी जिंदगी भी एक कहानी बनती जा रही थी। वह अपनी जिंदगी में आई सभी परेशानियों से मुक्त हो जाना चाहती थी। उसकी सूखी आंखों में आंसू आ गए और वह भरे हुए गले और मन से कमरे में आकर पलंग पर लेट गई। उसकी खामोशी, बौखलाहट और आंसू के साथ कमरे में सन्नाटा पसरा था। अपने पति और ससुराल वालों से अलग रहने पर उठते सवालों पर उसने पीहर वालों को जवाब दे दिया था। इस बार वह अपना दर्द अपने किसी भी भाई-भाभी को बता नहीं पा रही थी। उसने सबसे बड़े भैया के यहां दिल्ली जाने का मन बना लिया और अपने छोटे भैया को ट्रेन से टिकट की व्यवस्था करने के लिए कहा। छोटे भाई-भाभी द्वारा उसे रुकने के लिए बहुत समझााने पर भी वह नहीं मानी तो वे उसे दिल्ली भेजने के लिए मान गए और बड़े भैया को बता दिया। 


सुबह से ही आसमान बादलों से घिरा था। दिन भर बारिश होती रही थी। दिल्ली जाने के लिए शाम को वह बेबी के साथ स्टेशन रवाना हो गई। हमेशा की तरह छोटे भैया और भाभी उसे स्टेशन तक छोडऩे आए थे। खराब मौसम के चलते भैया और भाभी ट्रेन रवाना होने से पहले ही घर रवाना हो गए थे। वह अपने डिब्बे में बर्थ पर एक ओर सामान रखकर बेबी के साथ लेट गई। वह अपनी जिंदगी में जो कुछ भी घटित हो रहा था उससे खुद को भीतर और बाहर से बुरी तरह हताश और टूटा हुआ महसूस कर रही थी। यही सब सोचते हुए वह यादों के गलियारे में घूमने लगी। 


चार भाइयों की वह सबसे छोटी इकलौती बहन थी। बचपन में ही माता-पिता के निधन के बाद भाइयों ने उसे बहुत प्यार से पाला था। सभी भाई अपने विवाह के बाद नौकरी और परिवार के साथ अलग-अलग शहर में बस गए थे। उसकी जहां भी इच्छा होती, वह उस भाई के घर रहने चली जाती थी। सभी उसे प्यार और महत्व देते थे। उनके बच्चे भी उससे बहुत प्यार रखते थे। 


गुजरते वक्त के साथ उसकी पढ़ाई पूरी होते ही परिवार वालों ने उसकी सहमति से अमर के साथ विवाह तय कर दिया। अमर और उसने एक दूसरे को पसंद किया था। चार बहनों का इकलौता छोटा भाई अमर सरकारी बैंक में अधिकारी था। बहनों का विवाह हो चुका था और वह अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ दूसरे शहर रहता था। 


विवाह तय होने के दिन से ही वह भविष्य के सपने बुनते हुए उनमें खोने लगी थी। अपने प्रियतम की तस्वीर जो उसने जेहन में बना रखी थी अमर वैसा ही था। वह शुभ दिन भी आया जब धूमधाम से उसका विवाह अमर से हो गया।  


कुछ दिन तो उसके अपने ससुराल में सुख शान्ति से गुजरे लेकिन उसे लगने लगा कि उसके और ससुराल वालों के विचारों में कोई समानता नहीं और जीवनशैली में जमीन आसमान का अंतर है। सभी का गंभीर स्वभाव और अनुशासित जीवनशैली थी। उनकी बहुत सी आदतें, पसंद नापसंद उसे बेमानी लगते थे। बुजुर्ग सास-ससुर का रहन-सहन और खान-पान उसे बिल्कुल नहीं सुहाता था। अमर का ज्यादा समय साहित्य को देना और बागवानी करना भी उसको नागवार गुजरता। ससुराल एक परंपरागत और रीति-रिवाजों की दहलीज में रहने वाला परिवार था। उसका ज्यादा समय अपने पीहर वालों से मोबाइल पर बातें करने में बीतता था।


उसके पहनावे, दिनचर्या व्यवहार को अल्पशिक्षित सास-ससुर सहजता से नहीं ले पा रहे थे। उसकी उच्छृंखल जीवनशैली से अमर भी खुश नहीं था। उसे समझााता कि वे इतने आधुनिक नहीं हुए कि उनके परिवार में और समाज में यह सामान्य बाते हों। लेकिन उसके समझा में कुछ नहीं आता था। उसका कहना था कि वह अपने विवाह के बंधन को ऐसा पिंजरा नहीं बना सकती जहां उसका अस्तित्व एक पर कटे पंछी की तरह रह जाए। 


एक दिन उसने अमर से कहा कि वह उसके माता-पिता के साथ नहीं रह सकती, इसलिए उन्हें अलग मकान लेकर रहना होगा। यह सुनते ही अमर की आंखों से आंसू ढुलकने लगे। अमर ने उसे इसके लिए साफ  इनकार कर दिया। उसके लिए यह किसी भी स्थिति में सम्भव नहीं था। उसे परिवार के प्रति अपना दृष्टिकोण और विचारधारा बदलने के लिए कहा। अमर ने उसे समझााया कि परिवार के प्रति उसका नजरिया बदलने से सब कुछ बदल जाएगा। अमर के मन में उसके प्रति कोई कड़वाहट नहीं थी।


 अमर की किसी भी बात का उस पर कोई असर नहीं हुआ। परिवार में सभी की भावनाओं के सम्मान करने का सुनकर वह गुस्से से झानझाना उठी और अमर को बहुत खरी-खोटी सुनाई। उसे लगने लगा था कि अपने भविष्य को लेकर उसने जो सपने देखे थे, वे इन हालात में पूरे नहीं हो सकते थे। अपने ससुराल वालों से बिना किसी कारण नापसंदगी से उसका असंतोष उबलकर बाहर आ गया था। उसके लिए वहां रहना लगभग नामुमकिन हो चुका था। विवाह के लगभग चार महीने बाद ही वह अपने पीहर चली गई। 


पीहर में भी सभी ने उसे बहुत समझााया कि गुजरते वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन उसकी समझा में कुछ नहीं आया। वह ससुराल एक ही स्थिति में जाने के लिए तैयार थी कि अमर अपने माता-पिता से अलग मकान लेकर रहे। यह अमर के लिए संभव नहीं था। अमर कई बार उसे लेने आया लेकिन वह नहीं गई। इस दौरान उसके बेटी का भी जन्म हो गया। अमर ने प्यार से उसका नाम बेबी रखा था। 


बेबी के जन्म के बाद जब ससुराल वाले उसे लेने आए, वह उस समय भी इनके साथ नहीं गई। विवाह के बाद पीहर में रहते हुए चार वर्ष का समय हो चुका था। वह कुछ महीनों के लिए एक भाई के परिवार के साथ और कुछ महीने दूसरे भाई के यहां रहते हुए अपनी जिंदगी जी रही थी। वह अपनी जिद के चलत खानाबदोश की जिंदगी जी रही थी। उसका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था।


पति और ससुराल वालों से अलग, उसके पीहर रहने से समाज में तरह-तरह की अफवाहें और आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं। कानाफूसी के गलियारों में आती अस्पष्ट आवाजें उसे ही दोषी मानकर आने वाले समय में इसका खामियाजा बेबी को न भुगतना पड़े, इससे आशंकित थी।


ट्रेन के किसी स्टेशन पर रुकने से आए हल्के झाटके से वह वर्तमान में लौटी। घड़ी रात के बारह बजा रही थी। उसने खिड़की से बाहर झाांककर स्टेशन का नाम पढ़ा तो उसे पता चला कि ट्रेन लगभग तीन घंटे देर से चल रही थी। इसका मतलब कि ट्रेन दिल्ली सुबह दस बजे पहुंचती। दिल्ली से तीन घंटे पहले उसका ससुराल आता था। उसकी आंखों से नींद गायब थी। उसके मन में बेचैनी का बवंडर घूमने लगा। उसे लगने लगा कि उसने अमर और उसके परिवार वालों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। ससुराल के जाने पहचाने पल और दृश्य उसकी आंखों के सामने चलने लगे। उसके व्यवहार के कारण ससुराल वालों का दर्द, शूल की तरह दिल में चुभने लगा। 


उसने अपना मोबाइल निकाला और अमर का नंबर डायल किया। रात के दो बज रहे थे। अमर को उसने कहा कि वह उसके पास लौटना चाहती है। उसका दर्द फूट-फूट कर आंसुओं में बहने लगा। ट्रेन का नम्बर और पहुंचने का समय पूछकर अमर ने उसे शांत रहने के लिए कहा। वह आंखें बंद करके लेट गई। उसे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। अचानक उसकी आंख खुली और उसने खिड़की से बाहर देखा तो रात अपने आखिरी लम्हे गिन रही थी। सुबह होने को थी। उसकी लंबी रातों में सुबह फिर आ रही थी। बारिश के बाद खुशगवार हवा चल रही थी। 


कुछ देर बाद उसका ससुराल आ गया। स्टेशन के प्लेटफार्म पर लैम्प पोस्टों की हल्की रोशनी के बीच काफी हलचल थी। चेहरे पर कई तरह के भाव आ जा रहे थे। अमर को देखते ही उसकी आंखों के किनारे गीले हो गए। उसने जल्दी से अपना सामान उठाया और बेबी के साथ डिब्बे से प्लेटफॉर्म पर उतर गई। अमर को अपनी ओर आता देख किसी मुजरिम की तरह उसने अपना मुंह चुरा लिया। उसके गालों पर पश्चाताप के आंसू ढुलकने लगे। उसे आत्मग्लानि होने लगी थी। 


अमर ने बेबी को गोद में लेकर अपना हाथ उसके सिर पर फेरा। अमर की आंखों में ढेर सारा प्यार था। इस स्पर्श ने पिछले वर्षों की दूरी को पाट दिया था। वह अंदर तक भीग गई और आंखों में फिर से आंसू अटक गए। मानो उसका वजूद ही पिघलने लगा था। अमर ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, अब तुम्हे खानाबदोश की तरह जिंदगी जीने की जरूरत नहीं, आओ अपने घर चलो। यह सुनकर उसका चेहरा खिल उठा मानों उसकी जिंदगी में फिर एक साथ सैकड़ों गुलाब खिल उठे थे।


  
प्लेटफार्म पर एक पेड़ के नीचे खड़े वे बाहर निकलने वाले लोगों की भीड़ कम होने का इंतजार करने लगे। पेड़ की घनी पत्तियों से छनकर धूप उनके चेहरे पर गिर रही थी। एक नया खुला आसमान उसके सामने था। जिंदगी ने उसे भरपूर जिंदगी जीने का दुबारा मौका दिया था। वह भी उड़ान के लिए पंख फैलाए तैयार थी। उसकी आंखों में प्रकाश था। दूर खड़ा गार्ड हरी टॉर्च दिखाता हुआ सीटी बजा रहा था। इंजन के सीटी देते ही गाड़ी अपनी मंजिल की ओर चल दी थी, और वह अपने पीहर वालों को मोबाइल पर सूचना देकर, अपनी मंजिल की ओर।

सुधीर केवलिया

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