इंजीनियर की जॉब से कमाते थे 24 लाख, नौकरी छोड़ बन गए किसान, कमाई 2 करोड़

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इंजीनियर की जॉब से कमाते थे 24 लाख, नौकरी छोड़ बन गए किसान, कमाई 2 करोड़

विलासपुर माधपुर गांव के निवासी सचिन काले आज मॉडल फार्मिंग को लेकर क्षेत्र के किसानों के बीच मिसाल बने हुए हैं।

सचिन ने अपनी 15 साल की कमाई मॉडल फार्मिंग सिस्टम को विकसित करने में लगा दी। यह सोचकर खेती का काम शुरू किया कि विफल रहा तो कॉरपोरेट लाइफ में वापस लौट आऊंगा। लेकिन उनका यह प्रयास इतना कामयाब रहा कि अब वह कई लोगों को रोजगार मुहैया करा रहे हैं।



विलासपुर माधपुर गांव के निवासी सचिन काले आज मॉडल फार्मिंग को लेकर क्षेत्र के किसानों के बीच मिसाल बने हुए हैं। लेकिन जब चार साल पहले उन्होंने 24 लाख रुपए प्रति वर्ष की कॉरपोरेट लाइफ की नौकरी को छोड़ कर विरासत में मिली जमीन पर खुद की फॉर्मिंग का काम शुरू किया था तो वह खुद भी डरे हुए थे कि उनका यह कदम यही है या नहीं।



पर अब उनकी प्रति वर्ष की कमाई दो करोड़ रुपए से अधिक है। ऐसा कर उन्होंने न केवल अपने दादा वसंत राव काले के सपने को पूरा किया, बल्कि अब उनका सपना अपनी एग्री कंपनी को मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग कराकर इसका शेयर बाजार में लॉन्च करने की दिशा  में भी कदम बढ़ा दिया है। 



दादाजी ने किया प्रोत्साहित 

सचिन काले जब पढ़ाई करते थे, तब उनके दादा कहा करते थे आप पैसे के बिना तो जिंदा रह सकते हैं, पर बिना भोजन के नहीं। अगर आप खुद का पेट भरने के लिए फसल उगाना जानते हैं तो हालात कितने भी बुरे क्यों न हों आप जिंदा रह सकते हैं। विरासत में मिली 25 एकड़ भूमि का जिक्र करते हुए वह कहते थे कि अगर इस भूमि को फॉर्मलैंड में तब्दील कर दिया जाए तो उनका सपना पूरा हो जाएगा। दादाजी की इन्हीं बातों से सचिन को फॉर्म लैंड खोलने की प्रेरणा मिली। 



इंजीनियर या डॉक्टर बनाना चाहते थे पिता 

हर मध्यवर्गीय अभिभावक की तरह सचिन के पिता चाहते थे कि उनका बेटा इंजीनियर या डॉक्टर बने। इस वजह से सचिन ने आरईसी नागपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग, एमबीए (फाइनेंस), लॉ और उसके बाद डवलपमेंट इकोनॉमिक्स में पीएचडी करने के बाद पुंज लॉयड में 13 साल तक नौकरी की।


कॉरपोरेट लाइफ के दौरान उन्हें दादा जी कही बातें हमेशा याद आती थी। वह ये सोचने लगे कि दूसरों के लिए काम क्यों करें, खुद के लिए क्यों नहीं? अंतत: उन्होंने उस फूड इंडस्ट्री के क्षेत्र में काम करने का निर्णय लिया और कॉरपोरेट की शानदार नौकरी को अलविदा कह गांव माधपुर शिफ्ट हो गए।

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