Movie Review: फुंक गया 'ट्रांसफॉर्मर्स'

kamlesh sharma

Publish: Jun, 30 2017 05:44:00 (IST)

Entertainment
Movie Review: फुंक गया 'ट्रांसफॉर्मर्स'

हॉलीवुड में 'ट्रांसफॉर्मर्स' हिट फ्रेंचाइजी है, जिसके दीवाने साइ-फाइ फिल्में पसंद करने वाले भारतीय दर्शक भी हैं।

डायरेक्शन : माइकल बे

स्टोरी : अकीवा गोल्ड्समैन, आर्ट मार्कुम, मैट हॉलोवे, केन नोलन

स्क्रीनप्ले : आर्ट मार्कुम, मैट हॉलोवे, केन नोलन

जोनर : साइंस-फिक्शन एक्शन

सिनेमैटोग्राफी : जोनाथन सेला

एडिटिंग : मार्क सैंगर, जॉन रेफोवा, एडम गेरस्टेड, रोजर बार्टन, डेब्रा नील फिशर, कैल्विन विम्मर

रेटिंग : 1.5  स्टार



स्टार कास्ट     मार्क वॉल्बर्ग, जोश दुहामेल, एंथनी होपकिंस, लॉरा हैडॉक, इजाबेला मोनेर, स्टेनली टुक्की, जॉन टुरटुरो, जेराड कार्मिचाइल



हॉलीवुड में 'ट्रांसफॉर्मर्स' हिट फ्रेंचाइजी है, जिसके दीवाने साइ-फाइ फिल्में पसंद करने वाले भारतीय दर्शक भी हैं। लिहाजा इस फ्रेंचाइजी की पांचवीं फिल्म 'ट्रांसफॉर्मर्स : द डार्क नाइट' का भारतीय दर्शकों को भी बेसब्री से इंतजार था, लेकिन यह 'ट्रांसफॉर्मर' स्क्रैप मेटल के ढेर से ज्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, माइकल बे निर्देशित इस फिल्म की लचर स्क्रिप्ट और कमजोर एडिटिंग के कारण दर्शकों को वह मनोरंजन नहीं मिल पाता जिसकी उम्मीद उन्होंने लगाई थी। वीएफएक्स और तकनीक पर अच्छा फोकस किया है, लेकिन इसके बावजूद फिल्म दर्शकों से कनेक्ट नहीं करती। फिल्म बोरिंग और आवश्यकता से अधिक खिंची हुई है, जो सिर्फ दर्शकों का टाइम वेस्ट करती है।



स्क्रिप्ट

फिल्म मध्यकालीन युग से शुरू होती है, जिसमें युद्ध जीतने के लिए ट्रांसफॉर्मर की तलाश दिखाई जाती है। इसके बाद कहानी वर्तमान में आ जाती है, जहां सैनिकों का एक समूह नए खतरों का सामना करने को तैयार है, वहीं कैड यीगर (मार्क वॉल्बर्ग) फ्रेंडली ऑटोबोट्स के साथ मानवता को बुराई से बचाने में जुटे हुए हैं। एक्शन और थ्रिल के साथ कहानी आगे बढ़ती है और एक सुखद अंजाम पर खत्म होती है।



एक्टिंग  

मार्क वॉल्बर्ग ने अच्छा अभिनय किया है। एक्शन सीक्वेंस में भी वह जमे हैं। लॉरा हैडॉक की परफॉर्मेंस अच्छी है। इजाबेला अपनी अदायगी से लुभाती है, वहीं स्टंट्स में भी उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है। जोश दुहामेल और एंथनी होपकिंस अपने किरदारों में फिट हैं। जेराड अपनी कॉमिक टाइमिंग और एक्टिंग से हंसाने में कामयाब रहे हैं।



डायरेक्शन  

माइकल बे ने तकनीक का इस्तेमाल तो भरपूर किया है, लेकिन इंटरेस्टिंग स्क्रिप्ट के अभाव में और स्क्रीनप्ले में लूज होल्स के कारण वह मजेदार फिल्म बनाने में नाकाम रहे। वीएफएक्स वर्क कमाल का है। ट्रांसफॉर्मर्स यानी रोबोट्स का बनना-बिखरना आकर्षक है। सिनेमैटोग्राफी वर्क भी अच्छा है, लेकिन एडिटिंग टाइट नहीं है। इस कारण करीब ढाई घंटे की यह फिल्म बोर करती है।



क्यों देखें :   

 किसी भी हिट फ्रेंचाइजी के नेक्स्ट पार्ट से दर्शक हमेशा यह एक्सपेक्टेशन रखते हैं कि उन्हें कुछ नया और मजेदार मिलेगा। लेकिन 'ट्रांसफॉर्मर्स' सीरीज की यह फिल्म संसाधनों की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है। फिल्म लाउड है और समझ से परे है। ऐसे में दर्शक 'ट्रांसफॉर्मर्स' के ब्लास्ट से हुोने वाले शोर-शराबे से दूर ही रहें तो बेहतर है।

Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned