#BanChildMarriage : लड़किया ही नहीं लड़के भी झेलते हैं बाल विवाह का दंश

Jodhpur, Rajasthan, India
#BanChildMarriage : लड़किया ही नहीं लड़के भी झेलते हैं बाल विवाह का दंश

अक्सर बाल विवाह की तस्वीर में हम गुड्ढे-गुडि़या थामे बच्चों की ही कल्पना करते आएं हैं और बच्चियों पर होने वाली त्रासदी की ही हम कल्पना करते आए हैं लेकिन इसका दंश लड़के भी बराबर झेलते हैं।

बाल विवाह का दंश दो अबोध बच्चों को न केवल समय से पूर्व परिपक्व करने पर मजबूर करता है बल्कि उनके आगामी भविष्य पर कई सवालिया निशान भी छोड़ देता है। अक्सर बाल विवाह की तस्वीर में हम गुड्ढे-गुडि़या थामे बच्चों की ही कल्पना करते आएं हैं और बच्चियों पर होने वाली त्रासदी की ही हम कल्पना करते आए हैं लेकिन इसका दंश लड़के भी बराबर झेलते हैं। बाल विवाह रोकने व निरस्त करवाने की मुहिम में जुटे सारथी ट्रस्ट की कृति भारती अपने अनुभव से जुड़े कुछ हिस्से यहां साझा कर रही हैं।


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स्टोरी 1


अभी उसके आसपास गुड्ढे-गुड्ढियों का ढेर लगा रहता था कि सिर्फ 14 माह की अबोध उम्र में समुनलता को बाल विवाह की बेडिय़ों में जकड़ दिया। बाड़मेर जिले के चौहटन निवासी अठारह साल की सुमनलता का बाल विवाह 1999 में गांव के बुजुर्ग लोगों के दबाव में कर दिया गया। थोड़ी बड़ी होने पर ससुराल वालों की ओर से गौना किए जाने का दबाव बढऩे लगा। इसके चलते उसकी पढ़ाई-लिखाई तक छूट गई। हिम्मत जुटा कर सुमनलता ने अपने परिजनों को बाल विवाह तोड़वाने के लिए राजी कर लिया लेकिन जाति पंचों समाज से बाहर निकालने और आर्थिक दंड लगाने का भय दिखाया। एेसे में सुमनलता को अपना भविष्य अंधकार में लगने लगा। नजदीकी रिश्तेदारों ने उसकी सहायता की। सारथी ट्रस्ट की मैनेजिंग ट्रस्टी कृति भारती ने बताया कि ट्रस्ट से जुडऩे के बाद सुमनलता ने पारिवारिक न्यायालय में वाद दायर किया।न्यायिक सुनवाई में सुमनलता की ओर से कृति भारती ने पैरवी कर न्यायालय को सुमनलता के बाल विवाह निरस्त के तथ्यों और आयु संबंधी प्रमाणिक दस्तावेजों से अवगत करवाया। 1 ने अगस्त 2016 में सुमनलता का बाल विवाह निरस्त हुआ। आज सुमनलता पढ़ाई के साथ कौशल प्रशिक्षण लेकर खुद का जीवन संवार रही है।


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स्टोरी-2


उसने अभी सही से चलना भी नहीं सीखा था कि परिजनों ने महज 11 साल की उम्र में उसका ब्याह कर दिया। कमठा मजदूर पिता ने अबोध की शादी अपनी आर्थिक तंगी से परेशान होकर कर दी लेकिन लूणी तहसील के एक गांव की रहवासी संतादेवी को समाज की इन रुढि़यों को तोडऩे में बीस साल लग गए। बाल विवाह इनकार करने पर उसे खासे सितम झेलने पड़े। यहां तक कि उसके परिवार पर जाति पंचों ने लाखों रुपयों का दंड तक लगाया लेकिन बाल विवाह के खिलाफ लड़ी इस जंग में संता ने न केवल अपनेआप को जिताया बल्कि एक सशक्त आवाज बनकर आज वह शिक्षक बनकर अगली पीढ़ी को मजबूत बनाने में जुटी हुई है। समाज के इन थोपे हुए बंधनों से मुक्त होना संतो के लिए कोई आसान बात नहीं थी। शादी की बात पर जब उसकी सहेलियां मजाक करती तो उसने इस कुरीति के बंधन से मुक्त होने की ठानी और अपनी ही तरह एक बाल विवाह निरस्त होने की कहानी पढ़ी। ससुराल वालों की ओर से गौना करने का दबाव बढऩे पर उसने सारथी ट्रस्ट का हाथ थामा। संता की सुरक्षा के साथ उसके परिजनों की काउंसलिंग की गई। पारिवारिक न्यायालय ने आखिर संतादेवी को बाल विवाह के बंधन से मुक्त करवाया।


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स्टोरी -3


अक्सर बाल विवाह में लड़कियां ही ज्यादतियां झेलती आई हैं। लड़कों की मनोस्थिति पर शायद कोई गौर नहीं करना चाहता या फिर लड़कों को क्या परेशानी कहकर इस प्रश्न को टाल दिया जाता है। लेकिन इस कहानी में एक नाबालिग किशोर खुद से दस साल बड़ी युवती से हुए बाल विवाह में बंधकर घुटन महसूस करता रहा। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे बीकानेर निवासी सत्रह वर्षीय किशोर श्रवण (बदला हुआ नाम) ने जब बाल विवाह को मानने से इनकार किया तो उसपर घर से बहिष्कृत किए जाने का दबाव बनाया गया। वहीं युवती के परिजन के निधन होने पर श्रवण पर यह दबाव दिनोंदिन बढ़ता ही गया। जोधपुर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे श्रवण ने आखिर सारथी ट्रस्ट का सहारा लेकर अपना बाल विवाह निरस्त करवाया। इस संबंध में युवती की काउंसलिंग की गई। आखिर उसने भी अपनी सहमति जाहिर की। इस कहानी का सबसे रोचक पहलू यह रहा कि जिस आखातीज पर बाल विवाह की बाढ़ सी आ जाती है। आखिर 2016 की आखातीज पर ही श्रवण ने खुद को और बंधन में बंधी युवती को कुरीति से मुक्त किया। 

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