इक्कीसवीं सदी में भी महिलाओं को अधिकारों से वंचित करना सदमे जैसा: हाईकोर्ट

Harshwardhan Bhati

Publish: Mar, 11 2017 08:03:00 (IST)

Jodhpur, Rajasthan, India
इक्कीसवीं सदी में भी महिलाओं को अधिकारों से वंचित करना सदमे जैसा: हाईकोर्ट

राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से महिला अभ्यर्थी को अपने ही नियमों के विपरीत उसके अधिकारों से महरूम करने पर बहुत अफसोस का इजहार किया है। अदालत ने महिला याचिकाकर्ता को एक महीने में नियमानुसार नियुक्ति देने के आदेश दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से एक महिला अभ्यर्थी को अपने ही नियमों के विपरीत जाकर उसके अधिकार से वंचित करने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए महिला याचिकाकर्ता को एक माह में नियमानुसार नियुक्ति प्रदान करने के आदेश दिए हैं। 

अधिकार पाने से वंचित होना पड़ेगा !

जस्टिस निर्मलजीत कौर ने महिला दिवस के अवसर पर आदेश पारित करते हुए कहा कि यह सोचते हुए ही सदमा लगता है कि इक्कीसवीं सदी में महिला अभ्यर्थी को उस राज्य में रोजगार का अधिकार पाने से वंचित होना पड़ेगा, जिसमें वह पैदा हुई, पढ़ी, पली और बड़ी हुई। 

अपने राज्य में संपत्ति मिल सकती है

एक ओर तो सरकार ने पिता की संपत्ति में बेटियों को भी बराबरी का हकदार माना है यानी उस महिला को अपने राज्य में संपत्ति तो मिल सकती है, लेकिन उसकी शादी यदि दूसरे राज्य में हो गई तो उसे रोजगार नहीं मिलेगा।

शादी हरियाणा में हुई है

मामले के अनुसार याचिकाकर्ता हनुमानगढ़ निवासी मंजू स्वामी ने टीचर्स ग्रेड तृतीय भर्ती 2012 में ओबीसी महिला वर्ग में आवेदन किया था। उसने परीक्षा के बाद ओबीसी महिला वर्ग के कट ऑफ से अधिक 150.91 अंक प्राप्त किए। उसने भर्ती के लिए 20 अप्रेल 2012 को जारी विज्ञापन के अनुसार अपने पिता के नाम के साथ पैतृक जिले का ओबीसी प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत किया, लेकिन तब उससे उसका विवाह प्रमाण पत्र भी मांगा गया। इस पर पता चला कि उसकी शादी हरियाणा में हुई है।

दूसरे राज्य का प्रमाण पत्र नहीं मान सकते

इसे बहाना बनाते हुए सरकार ने उसके पैतृक जिले का प्रमाण पत्र अमान्य करार देते हुए कहा कि वह दूसरे राज्य का प्रमाण पत्र नहीं मान सकते, इसलिए उसे सामान्य व ओबीसी क्रीमिलेयर में मानेंगे। जिसके कट ऑफ ज्यादा है। 

प्रमाण पत्र आदि पेश करने की शर्त

इस पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने याचिका दायर करते हुए कहा कि सरकार ने खुद अपने विज्ञापन में जारी की गई शर्तों में विवाहित महिला अभ्यर्थियों को अपने पैतृक जिले के प्रमाण पत्र आदि पेश करने की शर्त रखी है। इसके अलावा राज्य सरकार के एक सर्कुलर में भी इसी तरह का नियम बताया गया है। जबकि इन सबके विपरीत जा कर सरकार ने याचिकाकर्ता को उसके अधिकार से वंचित किया है।



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