राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलने के मार्ग में आ रही बाधाओं के सम्बंध में किया खुलासा...

Jodhpur, Rajasthan, India
राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलने के मार्ग में आ रही बाधाओं के सम्बंध में किया खुलासा...

राजस्थानी को मान्यता नहीं देने के लिए सरकार पर दबाव

उडिय़ा भाषा के प्रख्यात कथाकार और साहित्य अकादमी नई में उडिय़ा भाषा परामर्शदात्री मंडल के संयोजक डॉ. गौरहरि दास ने अकादमी की ओर से जोधपुर में आयोजित कार्यक्रम में चौंकाने वाला बयान दे कर उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं देने के लिए हिन्दी के कतिपय साहित्यकार भारत सरकार पर दबाव बना रहे हैं। 


यह घोर निंदनीय है। जबकि राजस्थानी देश की प्राचीन एवं समृद्ध भाषा है। सीमांत क्षेत्र की भाषा होने के कारण भी राजस्थानी देश के लिए विशेष महत्व रखती है।


डॉ.दास साहित्य अकादमी नई दिल्ली की मेजबानी में रविवार को होटल चन्द्रा इन के सभागार में आयोजित उडिय़ा -राजस्थानी कथा साहित्य की त्रिदिवसीय राष्ट्रीय अनुवाद कार्यशाला के समापन समारोह में उदबोधन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को तुरंत ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना चाहिए । उन्होंने इस अवसर पर कहा कि पिछले तीन दिनों में उडिय़ा से राजस्थानी भाषा में चौदह कहानियों का अनुवाद किया गया।यह हमारे लिए गौरव का विषय है। उन्होंने इस अवसर पर घोषणा की कि शीघ्र ही राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानियों और कविताओं का उडिय़ा भाषा में अनुवाद किया जाएगा।





साहित्यकारों को जोडऩे का सेतु

समापन समारोह के अध्यक्ष साहित्य अकादेमी नई दिल्ली में राजस्थानी भाषा परामर्शदात्री मंडल के संयोजक डॉ. अर्जुनदेव चारण ने कहा कि अनुवाद कार्यशाला एक ओर उडिय़ा व राजस्थानी भाषाओं के साहित्यकारों को जोडऩे का सेतु बनी। वहीं दूसरी ओर हम एक दूसरे को रचनात्मक स्तर पर समझाने में सफल रहे। उन्होंने अनुवाद कर्म पर संतोष व्यक्त करते हुए संभागी साहित्यकार अनुवादकों का आभार जताया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के लेखक राजस्थानी भाषा में अनुवाद के प्रति उत्साहित हैं। साहित्य अकादमी अनूदित कहानियां अतिशीघ्र प्रकाशित करेगी।





अनूदित कहानियों का वाचन

अनुवाद कार्यशाला के समापन अवसर पर राजस्थानी साहित्यकार अनुवादक मीठेश निर्मोही, अरविंद आसिया, चैनसिंह परिहार,मधु आचार्य आशावादी, राजेंद्र जोशी, सत्यनारायण और राजेन्द्र बारहठ ने अनूदित कहानियों का वाचन किया। उडिय़ा साहित्यकार डॉ.अरविन्द राय बनोज त्रिपाठी ने भी विचार व्यक्त किए। अंत में दीप्ति प्रकाश महापात्र ने आभार प्रकट किया।

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