प्यास बुझी तो भूल गए पारंपरिक जलस्रोत, जोधपुर में अब बदहाल हो रही जल संस्कृति

Jodhpur, Rajasthan, India
प्यास बुझी तो भूल गए पारंपरिक जलस्रोत, जोधपुर में अब बदहाल हो रही जल संस्कृति

शहर परकोटे में परंपरागत जलस्रोतों ने हमारी पानी की आवश्यकता पूरी की। हालांकि इंदिरा गांधी नहर और जोधपुर लिफ्ट कैनाल आने के बाद हालात कुछ बदले।

रेत को भी समझ लिया पानी

हाय क्या चीज प्यास होती है


पानी है तो सबकुछ है और पानी नहीं तो कुछ नहीं। हमारी संस्कृति में जल एक संस्कार है। यह कहीं गंगा है तो कहीं आबे-जमजम है। हम भगवान श्री राम, केवट और सरयू नदी का नाम लेते हैं तो पानी उसमें शामिल होता है। आचमन में पानी का बहुत महत्व है। किनारे पर हो या सतह पर, मंझधार में हो या ब्रिटिश चैनल तक, पानी हर जगह पानी ही है। पानी की अहमियत मारवाड़ के लोगों से ज्यादा और कौन जान सकता है?


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पानी की कद्रो-कीमत सहरा-थार के लोग ज्यादा जानते हैं। हमारे पुरखे कभी मीलों दूर पैदल चल कर कुंओं, बावडि़यों, तालाबों और पोखरों से पानी भर कर लाते थे। यहां कलश, मटकियां और बाल्टियां लिए लोगों की कतारें नजर आती थीं। एेसा कभी नहीं होता था कि रोज पानी मयस्सर हो जाए। यह सिलसिला बरसों तक चला। शहर परकोटे में परंपरागत जलस्रोतों ने हमारी पानी की आवश्यकता पूरी की। हालांकि इंदिरा गांधी नहर और जोधपुर लिफ्ट कैनाल आने के बाद हालात कुछ बदले।


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शहर की प्यास बुझाने में कायलाना की बड़ी भूमिका रही है। हुआ यह कि जब इस धरा पर प्रचुर मात्रा में जलापूर्ति होने लगी तो हम अपने परंपरागत जलस्रोतों की सार संभाल करना भूल गए। नतीजतन ये बुरी हालत में पहुंच गए। इधर कुछ इलाकों में भू जल संतुलन गड़बड़ा गया। इस कारण जब कभी जलसंकट होता है तो कभी रिजर्व पानी के तौर पर काम में आने वाले तालाबों, पोखरों और बावडि़यों की बदहाली एक बाधा बन कर उभरती है। हम रोजाना नहाने, खाना पकाने और पीने के बाद बचा हुआ पानी यूं ही बहा देते हैं।


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वर्षा जल संरक्षण के प्रति गंभीरता नहीं है तो जल प्रबंधन को भी बहुत हल्के तौर पर लिया जा रहा है। पानी की यह बर्बादी हमारे लिए बड़ा संकट पैदा कर सकती है। अब सवाल यह होता है कि आखिर हम पुराने परंपरागत जलस्रोत और पानी कैसे बचा सकते हैं? हालांकि अभी भी इस संबंध में बहुत से प्रयास किए जाने बाकी हैं। 

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