नहीं चली हाड़ौती की शान, अब चलेगी सिर्फ फूल पत्तियां

Kota, Rajasthan, India
नहीं चली हाड़ौती की शान, अब चलेगी सिर्फ फूल पत्तियां

कोटा शहर के प्रमुख मार्गों, चौराहों व सार्वजनिक स्थलों पर रखे जाने वाले कचरा पात्रों पर कोटा-बूंदी शैली के चित्र बनाने के मामले में हुए विवाद के बाद नगर निगम ने भूल सुधार करते हुए कचरा पात्रों पर चित्रकारी की जगह फूल पत्तियां उकेरने के निर्देश दिए हैं।

शहर के प्रमुख मार्गों, चौराहों व सार्वजनिक स्थलों पर रखे जाने वाले कचरा पात्रों पर कोटा-बूंदी शैली के चित्र बनाने के मामले में हुए विवाद के बाद नगर निगम ने भूल सुधार करते हुए कचरा पात्रों पर चित्रकारी की जगह फूल पत्तियां उकेरने के निर्देश दिए हैं। इसकी पालना भी शुरू हो गई है। प्रबुद्धजनों ने इसके विरोध में सोशल मीडिया पर भी मैसेज चलाए थे। कुछ कलाकारों ने शुक्रवार को पत्रिका को भी संदेश भेजकर कचरा पात्रों पर कोटा-बूंदी शैली की चित्रकारी का विरोध जताया। 


आयुक्त डॉ. विक्रम जिंदल ने बताया कि कचरा पात्रों पर कोटा-बूंदी चित्रशैली के चित्र बनाए जाने पर शहर के चित्रकारों व कलाकारों ने उनसे व महापौर के पास आकर रोष प्रकट किया था। उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए निगम ने निर्णय किया कि कचरा पात्रों पर कोटा-बूंदी शैली की चित्रकारी नहीं की जाएगी। इसकी जगह फूल-पत्तियां बनाई जाएंगी। गुरुवार से यह कार्य शुरू हो गया। जल्द ही नए चित्र वाले कचरा पात्र सार्वजनिक स्थलों व मार्गों पर दिखेंगे।



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बनेंगे 1 हजार नए कचरा पात्र

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत निगम शहर के मुख्य सार्वजनिक स्थानों व गली-मोहल्लों में एक हजार नए कचरा पात्र रखवाने जा रहा है। 


वैभव का सम्मान

कोटा बूंदी शैली की चित्रकारी को कचरा पात्रों पर उकेर कर शहर को साफ करने की जो दलील दी थी, उसे बगैर किसी हठ के वापस ले नगर निगम ने एक अच्छा उदाहरण पेश किया है। पता चलने पर गलती सुधार लेना, शहर के लिए अच्छा शगुन है। कचरे से निपटने के लिए कला का 'कचरा' करना उचित नहीं था। इस बात को पूरी ताकत के साथ सामने लाने वाले कलाकारों को भी साधुवाद। 



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निगम और कलाकारों ने उस शैली के वैभव को बचाया है जिसका स्वर्णिम इतिहास पंद्रहवीं शदाब्दी से चला आ रहा है। प्रकृति की अद्भुत छटा से ओतप्रोत इस शैली में दक्षिणी, ईरानी, मुगली व मराठा शैली का समन्वय देखने को मिलता है। सुनहरे रंगों से सजी यह शैली हाड़ौती की शान रही है और संदेश देती है कि जीवन के लिए जल, जंगल और जमीं के सभी पहलूओं की कद्र करना सीखना चाहिए।


निगम यदि इस शैली के चित्रों का सूक्ष्म अध्ययन करे तो उसे गंदगी, गर्मी और आवारा मवेशियों से निजात पाने के रास्ते भी अवश्य ही मिलेंगे। दरअसल इस शैली के ऐतिहासिक चित्र उस  दौर की समस्यों और उनके समाधान की कहानियां भी अपने समेटे हुए है। बाग, फव्वारे, फूलों की कतारों और तारों भरी रातों के दृश्य शहर को स्मार्ट बनाने का रास्ता बताते हैं। नारियों को शिकार करते हुए बताने वाले चित्र स्त्री-पुरुष समानता को रेखांकित करते हैं। 



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कोटा के कला प्रेमी शासकों की शिकार में बेहद रुचि थी, इस कारण इस शैली के चित्रों में बाघ के आक्रामक तेवर भी दिखते हैं। बाघ को प्रतीक के तौर पर लेते हुए निगम को मुस्तैद हो जाना चाहिए। कला से जुड़े इस प्रसंग में जनता की भूमिका भी बेहद अहम हो गई है, क्योंकि कचरा पात्रों को अब कोटा बूंदी शैली के बजाए फूल पत्तियों के चित्रों से सजाया जा रहा है। यह भी कला का ही एक रूप है। 


कचरा पात्रों को साफ और उजला बनाए रखना सिर्फ निगम की ही जवाबदेही नहीं है, जनता को भी अपनी भूमिका सही से निभानी होगी। कला की कद्र करते हुए व्यवस्था आगे बढ़ेगी तो नि:संदेह कोटा को एक खूबसूरत और शालिन स्मार्ट सिटी बनने से कोई रोक नहीं पाएगा।

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