#मदर्स_डे_स्पेशलः कच्ची माटी को तराश रही 'मां'

Kota, Rajasthan, India
#मदर्स_डे_स्पेशलः कच्ची माटी को तराश रही 'मां'

बच्चों को मेंहदी, मांडना, पॉट पेंटिंग, फटे-पुराने कपड़ों से दरी-कालीन बनाना, मिट्टी के खिलोने और बर्तन बनाने के साथ ही बेकार समझ कर फेंक दी जाने वाली चीजों से सजावटी और उपयोगी सामान बनाने का प्रशिक्षण देती हैं। टेक्सटाइल डिजाइनर कविता ने इस अनूठे काम की शुरुआत अपनी जमा पूंजी से की है।

झुग्गी-झोंपड़ी से लेकर आलीशान घरों में रहने वाले 5000 से ज्यादा बच्चों की 'मां' हैं वो...इन बच्चों को ना तो उन्होंने जन्म दिया है और ना ही पाला है, लेकिन पिछले एक दशक से वह इन बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखा रही हैं। वह भी अपने खर्च पर। कच्ची माटी को तराशने के इस नेक काम को वह अकेले नहीं हैं। उनका पूरा परिवार उनका साथ देने में जुटा रहता है।



सड़कों पर बच्चों को भटकता देख थर्मल कॉलोनी निवासी कविता की ममता जाग उठी। मन किया कि उन्हें गोद ले लें और खूब पढ़ाएं-लिखाएं, लेकिन अगले ही पल विचार कौंधा कि एक बच्चा हो तो ठीक भी है। आंखों के सामने जब अनगिनत बच्चे घूम रहे हों तो क्या करें? इंजीनियर पति संजय परिहार ने कविता की इस उलझन को सुलझाने के लिए सलाह दी कि कच्ची माटी को तराशने का काम करो, ताकि वह हर मुसीबत से लडऩा सीखे और अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। इसके बाद कविता ने फिर कभी पलटकर नहीं देखा और पिछले एक दशक से वह 14-15 साल तक के बच्चों को छोटे-छोटे काम सिखाकर आत्म निर्भर बनाने में जुटी हैं। 



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खुद ही उठाती हैं सारा खर्च

कविता बच्चों को मेंहदी, मांडना, पॉट पेंटिंग, फटे-पुराने कपड़ों से दरी-कालीन बनाना, मिट्टी के खिलोने और बर्तन बनाने के साथ ही बेकार समझ कर फेंक दी जाने वाली चीजों से सजावटी और उपयोगी सामान बनाने का प्रशिक्षण देती हैं। इस प्रशिक्षण की शुरुआत उन्होंने अपने घर से ही की, लेकिन देखते ही देखते बच्चों की संख्या में इजाफा होने लगा और घर में जगह कम पडऩे लगी तो कविता ने संत तुकाराम सामुदायिक भवन के पास अम्बेडकर कॉलोनी क्षेत्र में एक घर खरीदा और वहां कविता आर्टशाला की स्थापना की। जहां हर रोज 60-70 बच्चे कुछ ना कुछ सीखने में जुटे रहते हैं।



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मदद के लिए बढ़े हाथ

टेक्सटाइल डिजाइनिंग में डिप्लोमा कर चुकी कविता ने इस अनूठे काम की शुरुआत अपनी जमा पूंजी से की, लेकिन जब काम बढ़ा तो पति भी आर्थिक मदद करने लगे। उनके पड़ोसियों और परिचितों को उनके इस हुनर की खबर लगी तो वह भी मदद करने के लिए आगे आ गए। घर पर बेकार हो चुका सामान वह कविता को दे देते हैं। जिसका इस्तेमाल वह बच्चों को प्रशिक्षण देने में करती हैं। इसका बड़ा फायदा यह हुआ कि उन्हें रॉ मटेरियल खरीदने के लिए बेहद कम पैसे खर्च करने पड़ते हैं। बदले में वह सामान देने वालों के बच्चों को भी प्रशिक्षण देती हैं।

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