Research: कामसूत्र की कजरारी से हुई थी अमिट स्याही की खोज

Kota, Rajasthan, India
Research: कामसूत्र की कजरारी से हुई थी अमिट स्याही की खोज

कामसूत्र का नाम सुनते ही लोग बगलें झांकने लगते हैं, लेकिन वात्सायन के इस ग्रंथ ने भारतीय इतिहास को संजोने में अहम भूमिका निभाई। कामसूत्र की कजरारी से सिर्फ काजल जैसे सौंदर्य प्रसाधनों ने ही जन्म नहीं लिया, बल्कि इतिहास को अजर-अमर बनाने वाली अमिट स्याही भी जन्मी थी

-3000 साल पहले भाटों ने जूट और ग्वार से बनाया था 'अटूटÓ कागज


कामसूत्र का नाम सुनते ही लोग बगलें झांकने लगते हैं, लेकिन वात्सायन के इस ग्रंथ ने भारतीय इतिहास को संजोने में अहम भूमिका निभाई। कामसूत्र की कजरारी से सिर्फ काजल जैसे सौंदर्य प्रसाधनों ने ही जन्म नहीं लिया, बल्कि इतिहास को अजर-अमर बनाने वाली अमिट स्याही भी जन्मी थी। हालांकि, इसकी खोज वात्सायन ने नहीं, बल्कि वंशावलियां लिखने वाले भाटों ने की थी। इन्हीं भाटों ने भारत में सबसे पहले 'अटूट' कागज के निर्माण की विधि भी खोजी थी। 


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पिछले दिनों पुणे के फग्यू्र्रसन कॉलेज में देश भर के 450 वैज्ञानिक और शोधार्थी जुटे। मौका था भारतीय विज्ञान सम्मेलन का। विज्ञान भारती की ओर से हुए इस आयोजन में कोटा के डॉ. बाबू लाल भाट ने इतिहास बदलने वाला शोध पत्र प्रस्तुत किया। 


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अपने शोध पत्र में उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहासकार कागज की खोज का श्रेय चीनियों को देने में जुटे रहे, लेकिन उन्होंने कभी वंशावलियों को टटोलकर नहीं देखा कि 3000 साल से पहले इन्हें लिखने के लिए कागज का इस्तेमाल कैसे हुआ? 


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उन्होंने प्राचीन वंशावलियों के आधार पर साबित किया कि भारत में चीन से पहले कागज का निर्माण शुरू हो गया था। ताड़पत्र, कपड़े और पत्थरों पर वंशावलियां लिख रहे भाटों को ऐसी चीज की जरूरत थी जिस पर खूबसूरती के साथ लिखा जा सके और फिर उसे आसानी से सहेजा जा सके। 


इसी जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने पटसन और ग्वार से कागज बनाने का तरीका खोजा था। कागज की खोज के साथ ही एक ऐसी स्याही की खोज शुरू हुई जो कभी ना मिटे। भाटों को इसका समाधान वात्सायन के कामसूत्र में मिला। उन्होंने कजरारी के काजल को अमिट स्याही में बदल लिया। 


7 साल तक चली खोज 



डॉ. बाबूलाल भाट वंशावली लेखकों पर शोध करने वाले देश के पहले शोधार्थी हैं। उन्होंने इतिहासकार प्रो. जगत नारायण के निर्देशन में कोटा विश्वविद्यालय से पीएचडी की। 


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सात साल तक देश भर में घूम कर वंशावली लेखकों, लिखने के तरीकों और संसाधनों को जुटाने वाले डॉ. भाट कहते हैं कि  दो बड़ी खोज करने और गांव-गांव गली-गली घूम कर हजारों साल का इतिहास संजोकर रखने वाले भाटों को इतिहासकारों ने कभी जगह नहीं दी। जबकि उनके लिखे इतिहास का हमेशा इस्तेमाल किया। 


ऐसे बनती थी अमिट स्याही 

डॉ. भाट के मुताबिक वात्सायन के कामसूत्र में कजरारी से काजल बनाने की तमाम विधियां बताई गई थीं। जिनमें सुधार कर वंशावली लेखकों ने अमिट स्याही बनाने के तीन तरीके खोजे। वंशावली लेखकों के सदियों पुराने दस्तावेजों में तीन प्रमुख तरीके मिलते हैं... 


1.  सबसे आसान तरीका: छह टका काजल, बारह टका बीयाबोल, छत्तीस टका खेर का गोंद, आधा टका अफीम, अलता पोथी तीन टका, कच्ची फिटकरी आधी टका को लेकर नीम के ठंडे पानी से तांबे के बर्तन में सात दिन तक घोटने से पक्की काली स्याही बन जाएगी। 


2. गोमूत्र स्याही: नीम का गोंद, उसकी दुगनी मात्रा में बीयाबोल और उससे दुगना तिल के तेल का बना हुआ काजल लेकर सभी को गोमूत्र में मिलाकर आग पर चढ़ा दें। पानी सूखने पर लाक्षा रस मिलाकर गोमूत्र से धोए हुए काले भांगरे के सर के साथ इसे घोटें। बेहद टिकाऊ काली अमिट स्याही बनेगी। 


3. सूखी अमिट स्याही: तिल के तेल से काजल पार कर उसे कांसे के बर्तन में पानी मिलाकर घोटें। घोटा नीम की मोटी टहनी से बना हो और उसके अग्र भाग तांबे का मोटा सिक्का मजबूती जड़ दें और फिर उससे इसे घोटें। एक बार घोटने के बाद लाख मिलाकर फिर से घोटें। ऐसा 15 से 20 दिन करना पड़ेगा। इसके बाद तैयार स्याही को सुखाकर रख लें और जब इस्तेमाल करना हो थोड़ा सा पानी मिला लें। 


भाटों ने ईजाद किया था  'अटूट' कागज

डॉ. भाट ने शोध में साबित किया है कि वंशावली लेखकों ने 3000 साल पहले  'अटूट कागज बनाने का तरीका खोज निकाला था। इसके लिए भाट जूट और ग्वार को निश्चित अनुपात में मिलाकर उसकी लुग्दी तैयार करते थे। जिसे कच्ची दीवारों पर लेप दिया जाता था। जब यह सूख जाते थे तो उन्हें फिटकरी के घोल में डुबोने के बाद फिर सुखाया जाता। 


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सूखने के बाद इसे सिलबट्टों पर घिसा जाता था, जिससे यह पतला और चिकना हो जाता था। तैयार कागज को निश्चित आकार देने के लिए काटकर दस्ते तैयार किए जाते थे। दस्तों से बहियां बनाकर वंशावली लेखक उनका इस्तेमाल करते थे। यह कागज ना तो आसानी से फटता-गलता था और ना ही इसमें दीमक लगती थी।


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