बोया पेड़ बबूल का...

Rajeev sharma

Publish: Mar, 16 2017 03:29:00 (IST)

Opinion
बोया पेड़ बबूल का...

जैसे पुराने 'नागनाथ' थे । अब 'सांपनाथ' है। हैं दोनों पक्के 'भाई'। इनके कारनामों से बेचारी जनता 'भरमाई'। आप देते रहो लोकतंत्र की लाख 'दुहाई'।

अगर 'अनैतिकता' के पंक में पड़ा एक आदमी अचानक 'नैतिकता' का राग अलापने लगे तो समझ जाइए कि या तो उसके 'दिमाग' को बड़ा झटका लगा है या फिर वह 'शैतान' से 'साधु' बन गया है। 



बेचारी कांग्रेस के साथ यही हो रहा है। एक जमाना था तब वह बहुमत को तोड़-मरोड़ कर सत्ता हासिल कर लेती और विपक्ष पर एक बेशर्म मुस्कान मार कर उनका ठट्ठा उड़ाती थी। जो उसने कल किया आज उसके साथ वही हो रहा है। 



गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद कुर्सी उसके लिए खट्टे अंगूर बन कर रह गई है। वह जनता के सामने लोकतांत्रिक स्यापा कर रही है पर मतदाता हंस रहे हैं और गा रहे हैं- बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होय। 



अपने यौवनकाल में कांग्रेस ने डेमोक्रेसी के साथ जो धत्कर्म  किये वह उल्टे लौटकर उसे ही वापस मिल रहे हैं। वैसे हमारी मोटी बुद्धि कहती है कि गोवा-मणिपुर की सत्ताहरण लीला से कांग्रेस को विचलित होने की जरूरत नहीं क्योंकि जो काम किसी जमाने में कांग्रेस करती थी वह कार्य आज भाजपा कर रही है। 



हमें यहां एक नेता का अद्भुत कथन याद आ रहा है, भारत देश में 'कांग्रेस' कभी समाप्त हो ही नहीं सकती क्योंकि यहां जो भी दल सत्ता में आता है वह शीघ्र ही कांग्रेस बन जाता है। नरेंद्र भाई चाहे कितने ही आदर्शवादी भाषण देकर अपने को पाक साफ बताएं। चाहे दिन में कितने भी कुर्ते बदल लें लेकिन सत्ता पाने के लिए वे वही कृत्य कर रहे हैं जो श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने से कांग्रेस में शुरू हुए थे। 



क्या भाजपा गोवा और मणिपुर में कुर्सी पाने के लिए चार दिन इंतजार नहीं कर सकती थी? मेरे प्यारे देशवासियों। आप निश्चिन्त रहें। सत्ताधारी दलों का नाम बदल जाए पर उनके करतब वही रहेंगे। 



जैसे पुराने 'नागनाथ' थे । अब 'सांपनाथ' है। हैं दोनों पक्के 'भाई'। इनके कारनामों से बेचारी जनता 'भरमाई'। आप देते रहो लोकतंत्र की लाख 'दुहाई'। जिसके हाथ कुर्सी उसी की जनता बनी 'लुगाई'।


व्यंग्य राही की कलम से 




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