चुनावी महालीला

Rajeev sharma

Publish: Mar, 15 2017 02:16:00 (IST)

Opinion
चुनावी महालीला

भैया अखिलेश को मय भाभी प्रचार में उतार दिया लेकिन उन्हें पता नहीं था जिस दिन से मोदी बिहार का चुनाव हारे थे उसी दिन से उन्होंने उत्तर प्रदेश में इलेक्शन की तैयारी शुरू कर दी।

चलो जी! एक और चुनावी महालीला सम्पन्न हो गई। इस लीला के नायक रहे नरेंद्र भाई मोदी और सहनायक बने अमित भाई शाह। दोनों गुजरातियों ने सिद्ध कर दिया कि वे चुनावी व्यवसाय के पक्के खिलाड़ी हैं। 



क्षमा करना यहां 'व्यवसाय' से हमारा अर्थ  'धंधे' से नहीं वरन् 'प्रोफेशन' से है। मोदी-शाह की इस जोड़ी ने पूरा चुनाव 'प्रोफेशनल' ढंग से लड़ा और न केवल  विरोधियों के लिए बिस्तर गोल कर दिए वरन् गाड़ी में पटककर यूपी और उत्तराखंड से खदेड़ दिया। 



बिहार में जब सम्पूर्ण विपक्ष संयुक्त होकर लड़ा और जीता था, तब विपक्षी दलों ने मन ही मन मान लिया था कि हम एक होकर मोदी की 'खाट' खड़ी कर सकते हैं। इसीलिए मैनजमेंट के एक बबुआ प्रशांत किशोर ने यूपी में राहुल की खाट सभाएं कीं। 



भैया अखिलेश को मय भाभी प्रचार में उतार दिया लेकिन उन्हें पता नहीं था जिस दिन से मोदी बिहार का चुनाव हारे थे उसी दिन से उन्होंने उत्तर प्रदेश में इलेक्शन की तैयारी शुरू कर दी। 



मीडिया ताली पटके देकर व्यंग्यबाण छोड़ता रहा कि देखो एक प्रधानमंत्री चुनाव अभियान में इस तरह भाग ले रहा है मानो नगरपालिका के चुनाव हो। तीन दिन तीन रात एक ही शहर में धरना दे दिया। 



मोदी की इसी अथक  मेहनत का परिणाम निकला कि विपक्ष समझ नहीं पा रहा कि वह रोये तो रोये कैसे। अपनी मायावती बहनजी का हाथी तो सचमुच 'पत्थर' का हो गया। यूपी में मोदी ने कांग्रेस से 'लालबहादुर शास्त्री' और बसपा से 'अम्बेडकर' छीन लिया।  



पंजाब की जीत का सेहरा राहुल गांधी पर बांध नहीं सकते क्योंकि वहां सारा खेल कैप्टन साहब ने खेला है। बहरहाल यह ना समझना कि मोदी चुप बैठ जाएंगे। जिसके हाथ में राज है वही सत्ता का सरताज है। 



अब विपक्ष को अपना नया रास्ता बनाना होगा। फिलहाल तो बेचारे चुनावी दंगल में चित पड़े, अपने हाथ-पांव टटोल रहे हैं। यादवीवंश युद्ध ने भी द्वापर युग की याद ताजा कर दी।




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