इस दुख के कारण हजार

Opinion
इस दुख के कारण हजार

मेरा दु:ख इस बात से और बढ़ जाता है जब मुझे बताया जाता है कि मेरे सारे पड़ोसियों में मैं सबसे ज्यादा दुखी हूं। वे सब खुशियों की सीढ़ी पर मुझ से ऊपर खड़े हैं। किससे अपने दिल का दर्द कहूं?

हां, मैं दु:खी हूं। इसलिए कि मैं एक दु:खी देश का वासी हूं। जब मेरा देश ही दु:खी है तो मैं कैसे सुखी हो सकता हूं। मैं दुखी हूं, यह बात मैं ही नहीं कह रहा बल्कि सारी दुनिया कह रही है। विश्व प्रसन्नता क्रमांक यानी वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में मेरे देश का स्थान एक सौ बाईसवां है। पिछली बार एक सौ अठारह था। यानी एक साल में मेरे दुख चार सीढ़ियां चढ़ गए हैं। 



मेरा दु:ख इस बात से और बढ़ जाता है जब मुझे बताया जाता है कि मेरे सारे पड़ोसियों में मैं सबसे ज्यादा दुखी हूं। वे सब खुशियों की सीढ़ी पर मुझ से ऊपर खड़े हैं। किससे अपने दिल का दर्द कहूं? किसके कंधे पर सिर रख कर रोऊं? समझ नहीं आ रहा। 



मैं तो खुश रहना चाहता हूं पर मेेरे अपने ही मुझे खुश होते देख नहीं सकते। अभी कल की बात है मैं अपनी महिला मित्र के साथ पार्क में बैठा- बैठा हंस रहा था तो मुझे एंटी रोमियो फौज ने आकर बुरा-भला कहा और सुसंस्कृत रहने की नसीहत दे डाली। 



मैंने कहा- भैयाजी। क्या सार्वजनिक स्थल पर हंसना मना है, तो उन्होंने मुझे ज्यादा न बोलने की सलाह दी और एक लात जमा कर सुसंस्कृति का ज्ञान दे दिया। मैं प्रसन्न होने पार्क में गया था और दुखी होकर आ गया। मैंने कहा- देखिए, गुरु गोरखनाथ को मैंने भी पढ़ा है। 



उनके शिष्य भर्तृहरि मेरे आदर्श है, जिसने शृंगार शतक रचा था। गोरख बाबा ने कहा था- ढबक न चलिबा, हबक न बोलिबा, अर्थात तन कर चलना नहीं, अहंकार से बोलना नहीं। गुरु गोरख ने कहा था- हंसिबा, खेलिबा, धरिबा ध्यानम यानी हंसते-खेलते ध्यान करना।  



वे और  आगबबूला हो कहने लगे- तू मजनूं की औलाद है, तू हमारे गोरख को जानता ही क्या है? चल भाग यहां से अपनी 'फंटी' के साथ। कसम से इतना अपमानित तो हम जीवन में कभी नहीं हुए थे लेकिन दुख का कारण सिर्फ प्रेम ही नहीं है। हजार कारण है। हम दुख से दूर रहना चाहते हैं और वे हमें सुखी देखना ही नहीं चाहते। 



व्यंग्य राही की कलम से 



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