रोटी, भूख और शासन

Rajeev sharma

Publish: Mar, 07 2017 02:33:00 (IST)

Opinion
रोटी, भूख और शासन

कमाते हम हैं और उड़ाते मंत्री, विधायक, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री हैं। राजभवनों में बैठे सफेद हाथी हमारी मेहनत के अरबों रुपए चर जाते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि इस धरती पर इतना खाद्यान्न होने के बावजूद लोग भूखे क्यों रहते हैं। इसका कारण है 'सरकार'। 'सरकार' मतलब 'शासन'।  'शासन' क्यों जरूरी है? व्यवस्था के लिए। लेकिन क्या आज की सरकारें सिर्फ 'व्यवस्था' तक सीमित रहती है। जी नहीं। अब तो लगता है कि 'शासन' जनता के गले की घंटी बनता जा रहा है। 



आप एक पल ठहर कर विचार कीजिए कि जनता का हक खा कौन रहा है? आप कमाते हैं, आपकी कमाई पर सरकार गिद्ध की नजर रखने लगी है। उसका बस चले तो आपकी सारी कमाई खींच कर आपके हाथ में भिंडी-बैंगन थमा दें। क्यों बजट के बाद सारा देश सिर्फ एक ही बात पर बहस करता है कि इनकमटैक्स में कितनी छूट दी गई है। क्यों भई क्यों? हमारी मेहनत की कमाई से सरकार अपना पेट क्यों भरे? 



कमाते हम हैं और उड़ाते मंत्री, विधायक, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री हैं। राजभवनों में बैठे सफेद हाथी हमारी मेहनत के अरबों रुपए चर जाते हैं। गरीब रोटी को रोता फिरता है और विधायकों को सरकारी कोटे से लाखों के वाहन मिलते हैं। आप सोचिए। लोग चोरी क्यों करते हैं? युवक धोखाधड़ी क्यों करते हैं? क्योंकि उनके पास रोजगार नहीं हैं। 



लोगों के भूखे रहने का बड़ा कारण है कि शासन उनके हिस्से का अन्न खा जाता है। कहावत भी है कि भूखे भजन न होय गोपाला, ये लो अपनी कंठी माला। भूखा आदमी कभी भजन नहीं करता। भूखा आदमी लूट करता है। डकैती डालता है। आप भी एक प्रयोग करके देखिए। चार दिन भूखे रह कर ध्यान दीजिए। आपको रोटी के अलावा कुछ सूझेगा ही नहीं। 



जो भी सरकार आती है वह भ्रष्टाचार मिटाने की बात करती है। कहां है भ्रष्टाचार? क्या एक रिक्शेवाला, तांगेवाला, ईंट ढोने वाला, सब्जी बेचने वाला, बाल काटने वाला भ्रष्टाचार करता है? नहीं, हकीकत में  भ्रष्टाचार करता है शासन यानी नेता, अफसर और सरकारी कर्मचारी। 




व्यंग्य राही की कलम से 




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