नहीं शुरू हो सकी ट्रोमा केयर यूनिट

firoz shaifi

Publish: Jan, 05 2016 11:59:00 (IST)

Jaipur, Rajasthan, India
नहीं शुरू हो सकी ट्रोमा केयर यूनिट

यहां वर्ष 2009 में फोरलेन हाई-वे बनने के साथ ही स्वीकृत की गई ट्रोमा केयर यूनिट व लाखों की लागत की एम्बुलेंस तो जिला चिकित्सालय को मिल गए, लेकिन अब तक ट्रोमा केयर यूनिट का मापदंडों के तहत संचालन शुरू हो सका है ओर ना ही एम्बुलेंस का उपयोग हो रहा है।

यहां वर्ष 2009 में फोरलेन हाई-वे बनने के साथ ही स्वीकृत की गई ट्रोमा केयर यूनिट व लाखों की लागत की एम्बुलेंस तो जिला चिकित्सालय को मिल गए, लेकिन अब तक ट्रोमा केयर यूनिट का मापदंडों के तहत संचालन शुरू हो सका है ओर ना ही एम्बुलेंस का उपयोग हो रहा है।

 लम्बे समय से बेकार पड़ी  एम्बुलेंसे खुद बीमार होने लगी है। ऐसे में उनके रखरखाव का और खर्च बढ़ रहा है। गत करीब बीस दिनों से ट्रोमा एम्बुलेंस मरम्मत व रखरखाव कार्य के तहत कोटा में खड़ी हुई है।

इसके अलावा अन्य आधा दर्जन एम्बुलेंस में से भी मरीजों के लिए सिर्फ दो का ही उपयोग किया जा रहा है, वह भी बहुत कम, अधिकांश मरीजों के लिए तो अनुबंधित निजी एम्बुलेंसों की सेवा लेकर ही ली जा रही है।

यह है ट्रोमा एम्बुलेंस
केन्द्र सरकार के नेशनल हाइवे ऑथोरिटी ऑफ इंडिया की ओर से 8 मार्च 2011 को जिला चिकित्सालय को ट्रॉमा केयर यूनिट के लिए एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई थी। एम्बुलेंस उद्घाटन के बाद से ही शो-पीस बनी रही है।

हाई-वे से किसी घायल को लाने के काम आई और ना कभी इससे उल्लेखनीय राहत मिली है। एम्बुलेंस में मौके पर प्राथमिक उपचार देने की सुविधाएं दी हुई है।

मरीज लेटाने के लिए बैंच व बोतल स्टैंड, चिकित्सक व नर्सिंंग स्टाफ के लिए कुर्सियां हैं। दो जनरेटर सेट, फ्रीज, पानी का टेंक, वॉश बेसन, दवा,  रैक, केबिन, पंखा, स्ट्रैचर आदि सुविधाएं हैं।

ऐसे है एम्बुलेंसों का हाल
ट्रोमा एम्बुलेंस कोटा में मरम्मत के लिए खड़ी है। एक एम्बुलेंस चिकित्सक को कॉल पर लाने ले जाने के लिए उपयोग में लिया जा रहा है। एक एम्बुलेंस ब्लड़ बैंक में लगी हुई है। इसका उपयोग रक्तदान शिविरों में आने-जाने व ब्लड स्टोर कर लाने-ले जाने में किया जा रहा है।

 एक बड़ी आयसर कम्पनी की एम्बुलैंस को ऑक्सीजन सिलेंडर लाने- ले जाने में उपयोग लिया जा रहा है। शेष दो में से एक (मार्शल जीप) एम्बुलेंस अरसे पुरानी होने से तेज रफ्तार से चलाने योग्य नहीं है, लेकिन कभी कभार मरीजों के लिए काम में आती है। सही तरीके से एक मात्र (टाटा विंगर) एम्बुलेंस का ही उपयोग हो रहा है।

मलाई पर ध्यान
यूं तो यहां जेएसवाई योजना के तहत 15 अनुबंधित एम्बुलेंस है। इनके लिए सात रुपए प्रति किलोमीटर व कोटा के लिए 1120 रुपए की दर तय की हुई है, लेकिन इनमें से  अधिकांश एम्बुलेंस चालक पांच-दस किलोमीटर की दूरी वाली प्रसूताओं को छोडऩे में आनाकानी करते है।

वहीं रात्रि के समय कोटा के लिए भी 12 सौ 20 से 15 सौ तक का किराया वसूल लेते है। लम्बी दूरी पर जाने से अधिक किराया मिलता है। इससे एम्बुलेंस चालक इस पर अधिक ध्यान देते है। नजदीक की प्रसूता परेशान होती रहती है।

-चिकित्सालय में एम्बुलेंस वाहनों एवं चालकों की कमी तथा कुछ वाहनों की कंडीशन सही नहीं होने से अनुबंध की एम्बुलेंस का ही अधिक उपयोग करना पड़ रहा है, फिर भी कई बार कमी आ जाती है।

 वैसे बीपीएल, महिला, बच्चे व कई बार आपातकालीन मरीजों को नि:शुल्क सेवा दी जा रही है। ट्रोमा एम्बुलैंस में खराबी आने से सर्विस के लिए भेजा हुआ है।

- डॉ. मनीष खरे,
एम्बुलेंस वाहन प्रभारी एवं हैल्थ मैनेजर
 जिला चिकित्सालय बारां

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