Father's day special : पढ़िए एक ऐसे पिता की कहानी जिसके लिए बेटियां ससुराल से भी दौड़ी चली आती है

Udaipur, Rajasthan, India
Father's day special :  पढ़िए एक ऐसे पिता की कहानी जिसके लिए बेटियां ससुराल से भी दौड़ी चली आती है

कैसी विडम्बना है कि हरेक माता-पिता अपने बेटे-बेटियों की समान रूप से परवरिश करते हैं। कई बार बेटियां अनजाने ही उपेक्षित हो जाया करती हैं।

कैसी विडम्बना है कि हरेक माता-पिता अपने बेटे-बेटियों की समान रूप से परवरिश करते हैं। कई बार बेटियां अनजाने ही उपेक्षित हो जाया करती हैं। बड़े होने पर बेटों की  बहुएं घर में आती हैं तो बेटियां किसी और घर की बहू बनकर घर से विदा हो जाती हैं। बचपन में माता-पिता जिस लगन और लाड़-प्यार से पालते हैं, अक्सर देखा जाता है कि बुढ़ापे में बच्चे माता-पिता को वो सम्मान और कद्र नहीं करते जिसके वे असल हकदार होते हैं। हकीकत यह भी है कि एेसा समय तो सबका आता है। एेसे में संस्कार और संवेदनाएं अगर प्रबल हों तो हालात अलग नजर आते हैं। कहीं, बेटियां पराए घर रह कर भी अपने माता-पिता को संभालती हैं तो कहीं बेटे-बहू उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं। 



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बहरहाल, पितृ दिवस पर आज चर्चा तीन एेसी बेटियों की जो पिछले साल भर से अपने लकवाग्रस्त पिता नारायणलाल कोठारी की देखभाल में जुटी हैं। सबसे छोटी बेटी नीलम बताती हैं 'पिताजी को ससुराल से बारी-बारी आकर उदयपुर में घर और अस्पताल में रहकर संभालना हमारे लिए थोड़ा मुश्किल तो था, लेकिन सुकून भी देता कि उम्र के इस पड़ाव पर अपने जीवनदाता की सेवा का मौका मिला है। हालांकि, इस काम में मेरी दोनों बड़ी बहिनों सुनीता और रेनू के अलावा भाभी ने भी साथ दिया...Ó भाई के बारे में  पूछे जाने पर कहती हैं उसे तो खुद अपना ही होश नहीं है तो पिता को क्या संभालता...? कैंसर से लड़ते मां को गुजरे भी 20 बरस हो गए। 


वे बताती हैं कि पिताजी एक आर्ट सेंटर पर काम करते थे। पिछले 13 माह से लकवाग्रस्त हो जाने से हम तीनों बहिनों ने तय किया कि मिल कर उनकी सेवा करनी है। मई में हम उन्हें लेकर अहमदाबाद भी गए। परसों ही उनका 64वां जन्मदिन वहीं अस्पताल में मनाकर लौटे हैं। हमें खुशी और गर्व है उनकी सेवा का मौका मिला।

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