International Museum Day: जानिए आहाड़ सभ्यता में क्या था ऐसा खास कि आज भी उसे सबसे विकसित सभ्यता माना जाता है

Udaipur, Rajasthan, India
International Museum Day: जानिए आहाड़ सभ्यता में क्या था ऐसा खास कि आज भी उसे सबसे विकसित सभ्यता माना जाता है

अरावली की उपत्यकाओं में 5200 से 3200 वर्ष पूर्व विकसित हुई आहाड़ संस्कृति बहुत विकसित थी। यहां पर व्यापार की इतनी संभावनाएं थी कि यह ट्रेड वे था। यहां के निवासी पानी की अहमियत जानते थे।

अरावली की उपत्यकाओं में 5200 से 3200 वर्ष पूर्व विकसित हुई आहाड़ संस्कृति बहुत विकसित थी। यहां पर व्यापार की इतनी संभावनाएं थी कि यह ट्रेड वे था। यहां के निवासी पानी की अहमियत जानते थे। आज से हजारों वर्ष पूर्व वह पानी को रिसाइकिल कर उसका पुन: उपयोग करते थे। इसके लिए लोगों ने घर में गहरे खड्डे भी खोद रखे थे।

पुरातत्व और संग्रहालय विभाग के अधीक्षक मुबारिक हुसैन बताते हैं कि लोगों में घरों में रहने की भी समझ थी। लोग पत्थरों से घर बनाकर और उस पर मिट्टी का लेप कर रहते थे। बरसात और धूप से बचाव के लिए लोग छतों पर पेड़ पौधों की पत्तियां डालकर उस पर गिली मिट्टी डालते थे ताकि धूप व बरसात से बचाव किया जा सके। 



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हुसैन ने बताया कि यहां की सभ्यता किसी आपदा से नहीं खत्म हुई, बल्कि यहां के लोग किसी अनहोनी से पहले ही छोड़ कर चले गए थे, इसलिए यहां के गांव और बस्तियां कई बार उजड़ी और बसी थी। 


भरपूर था पानी, करते थे खेती

आहाड़ संस्कृति के उस दौर में पानी की बहुलता थी, लेकिन लोग पानी का महत्व भी जानते थे, जल संरक्षण के लिए लोगों ने घर में खड्ड़े खोद रखे थे, जहां से नाली के माध्यम से पानी का एकत्रिकरण कर फिर से उसे रिसाईकिल कर उपयोग में लिया जाता था। यहों के लोग खेती कर अनाज को पका कर खाते थे। लोग गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर पाला करते थे। 


नाली-सड़कों वाले थे विकसित गांव

मुबारिक हुसैन बताते है कि आहाड़ सभ्यता में नालियां, कच्ची सीधी सड़के और सीध में बने घरों वाले विकसित गांव हुआ करते थे। यहां के लोग विधिवत जीवनयापन करना जानते थे। इसके लिए उनके पास सामान्य जीवनयापन के करीब सभी चीजें मौजूद थी। कपड़ों के लिए वह कपास की खेती भी करते थे। 




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तांबा था मुख्य धातु, हाथी दांत के थे आभूषण

आहाड़ सभ्यता में तांबा मुख्य धातु था, जिसका उपयोग मूर्तियां, बर्तन और अन्य चीजें बनाने के लिए किया जाता था। ये लोग कुल्हाड़ी बनाना जानते थे, लेकिन छिद्र का ज्ञान नहीं था, इसके लिए वह लकड़ी से कुल्हाड़ी बांध दिया करते थे। वही उस समय शृंगार की भी महता थी। लोग हाथी दांत से बने आभूषण पहनते थे, जिनमें बाली, नथ आदि प्रमुख थे। आहाड़ सभ्यता के लोगों में ईश्वर के प्रति आस्था भी थी। यहां के लोग जैन तीर्थंकर, भगवान विष्णु आदि की पूजा करते थे। उस समय की मिली मूर्तियों से उनके आध्यात्मिक जीवन के भी दर्शन होते हैं। 




विश्व संग्रहालय दिवस पर होंगे कई कार्यक्रम 

 विश्व संग्रहालय दिवस पर गुरुवार को शहर में कई कार्यक्रम होंगे। विभिन्न संस्थानों की ओर से संगोष्ठी आयोजन के साथ अन्य गतिविधियां होगी। महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन की ओर से विद्यार्थियों को सिटी पैलेस संग्रहालय में नि:शुल्क प्रवेश दिया जाएगा। मुख्य प्रशासनिक अधिकारी भूपेन्द्र सिंह आउवा ने बताया कि विद्यार्थियों को निर्धारित पहचान पत्र दिखाने पर नि:शुल्क प्रवेश दिया जाएगा। विद्यार्थियों के लिए पेंटिंग, रंगकारी, क्विज व अन्य कार्यक्रम होंगे। नि:शुल्क प्रवेश समय सुबह 10 से शाम 4 बजे तक रहेगा। इधर, राजस्थान विद्यापीठ के संघटक साहित्य संस्थान के पुरातत्व विभाग की ओर से सुबह 11 बजे संगोष्ठी होगी। मुख्य अतिथि इतिहासकार प्रो.के.एस. गुप्ता, मुख्य वक्ता पुरातत्ववेत्ता प्रो. ललित पाण्डेय होंगे।

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