उदियापुर से आई गणगौर, ईसर ले चाल्यो गणगौर...राजस्थान दिवस व मेवाड़ फेस्टिवल साथ-साथ

madhulika singh

Publish: Mar, 17 2017 07:14:00 (IST)

Udaipur, Rajasthan, India
उदियापुर से आई गणगौर, ईसर ले चाल्यो गणगौर...राजस्थान दिवस व मेवाड़ फेस्टिवल साथ-साथ

राजस्थान दिवस पर शहर में विविध आयोजन होंगे। पर्यटन विभाग तीन दिवसीय मेवाड़ फेस्टिवल के पहले दिन राजस्थान दिवस मनाएगा

 राजस्थान दिवस पर शहर में विविध आयोजन होंगे। पर्यटन विभाग तीन दिवसीय मेवाड़ फेस्टिवल के पहले दिन राजस्थान दिवस मनाएगा।  राजस्थान दिवस पर सरकारी इमारतों पर विद्युत सज्जा की जाएगी और राजस्थान मैराथन का आयोजन होगा। इस अवसर पर विविध आयोजनों के तहत धार्मिक स्थलों पर भजन-कीर्तन होंगे और पारम्परिक खेलकूद स्पर्धाएं करवाई जाएंगी, वहीं सूचना केंद्र में प्रदर्शनी लगाई जाएगी। पर्यटन विभाग के मेवाड़ फेस्टिवल व राजस्थान दिवस के एक साथ आयोजन के तहत गणगौर घाट पर गणगौर सवारी व गणगौर नौका की सवारी के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा। 30 मार्च को विभिन्न समाजों की गणगौर की सवारियां निकलेगी। इस दौरान जगदीश चौक पर लोक कलाकार प्रस्तुतियां देंगे। 

विभिन्न समाज की सजी धजी  महिलाएं गणगौरें लेकर जगदीश चौक पर घूमर करेंगे और गणगौर घाट पर पूजा के बाद गणगौर लेकर लौटेंगी। दूसरे दिन पर्यटन विभाग का सांस्कृतिक कार्यक्रम परदेशी पामणा होगा। तीसरे दिन गोगुंदा में विभाग की ओर से कार्यक्रम होगा।  दरअसल, आजादी पूर्व राजपरिवार के साथ विभिन्न समाज गणगौर का त्योहार सुख, सुहाग और समृद्धि की कामना के निमित्त मनाते थे। सभी की गणगौरें पिछोला किनारे त्रिपोलिया पहुंचती थीं। यही घाट कालान्तर में गणगौर घाट के नाम से जाना जाने लगा। आजादी के बाद राजपरिवारों की ओर से निकाली जाने वाली गणगौर की सवारी तो बंद हो गई लेकिन तत्कालीन महाराणा सज्जनसिंह के काल में आरंभ की गई गणगौर नाव की सवारी और विभिन्न समाजों की ओर से की जाने वाली पूजा-अर्चना आज भी चलन में हैं। 


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पर्यटन विभाग ने शहर से करीब 38 किलोमीटर दूर गोगुंदा में तीन दिवसीय मेवाड़ गणगौर उत्सव की शुरुआत की। उदयपुर की गणगौर यह कथा भी प्रचलित है कि राजघराने से संबंधित वीरमदास की कन्या गणगौर को चाहने वाले कई राव रईस थे। बंूदी के ईसरसिंह के साथ उसका संबंध तय कर देने से कइयों को ईष्र्या हुई और वे गणगौर को पाने की जुगत करने लगे। जब इस बात का पता ईसरसिंह को लगा तो वह उदयपुर आया और गणगौर को घोड़े पर बिठाकर ले गया। कहते हैं कि मार्ग में चम्बल नदी उफान के साथ बह रही थी। ईसर ने घोड़ा उसमें उतार दिया। परिणामस्वरूप तीनों को नदी बहा ले गई। इस संदर्भ में लोक श्रुतियों में गीत आज भी प्रचलित है- 'उदियापुर से आई गणगौर, ईसर ले चाल्यो गणगौर, चंबल बहती जावे पूर, डूब्यो घोड़ो ईसर ने गणगौर।'


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