ये क्या, हर साल बारिश में घर छोडऩा पड़ता है इस दंपती को.. जानिए, आखिर क्या है वजह..

Udaipur, Rajasthan, India
ये क्या, हर साल बारिश में घर छोडऩा पड़ता है इस दंपती को.. जानिए, आखिर क्या है वजह..

सरकारी मदद के इंतजार में घास-फूस की छत तले बीत गए 12 साल, न अफसरों ने फिक्र की, न ही इलाके के जनप्रतिनिधियों ने

पाणुंद में 12 साल पहले ट्रांसफार्मर में शॉर्ट सर्किट से हुआ अग्निकांड आज भी एक बुजुर्ग दंपती की आंखों में धधक रहा है। बारिश का मौसम आते ही इनका दर्द और बढ़ जाता है, जब बेटी के घर आसरा लेना पड़ता है। कारण, तबाही पर तात्कालिक सहायता के अलावा कुछ नहीं मिला। छत राख होने के बाद दंपती आज भी पत्तों, टहनियों से बने टापरे के नीचे रह रहा है। दंपती को मदद दिलाने में न अधिकारियों ने दिलचस्पी दिखाई, न जनप्रतिनिधियों ने ही फिक्र की।



भीण्डर से 20 किलोमीटर दूर पाणुन्द में 7 अप्रेल, 2005 को ट्रांसफार्मर जलने के कारण आधा दर्जन से ज्यादा आशियाने राख हो गए थे। इनमें 70 साल के प्यारजी औदिच्य का घर भी था, जिसके साथ कपड़े, अनाज, घरेलू साजो-सामान आदि नष्ट हो गए। आग इतनी भीषण थी कि छत ही आ गिरी थी। प्यारजी ने बताया, तब सरकारी मदद के नाम पर 50 किलो गेहूं और कुछ रुपए दिए गए थे। ढेरों आश्वासन मिले, लेकिन 12 साल में बड़ी मदद के लिए किसी ने झांका तक नहीं। बीपीएल चयनित दो सदस्यों वाला यह परिवार सरकारी खाद्य सामग्री और बेटी की मदद के भरोसे है। मुख्यमंत्री आवास योजना में आवेदन भी कर रखा है, लेकिन स्वीकृति नहीं मिल पाई है। प्यारजी की पत्नी लक्ष्मीबाई अस्थमा की शिकार है। टापरे से झड़ती धूल के बीच हांफते हुए उसने सवाल किया, वोट के लिए आने वाले अब मदद क्यों नहीं करते?



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बेटी के घर में कटते हैं बारिश के दिन

दंपती ने बताया कि आग से घर की छत टूट गई थी। तब से घास, खजूर के पत्तों और टहनियों से ढक रखा है। साल के आठ महीने जैसे-तैसे कट जाते हैं, लेकिन बरसात का मौसम दुश्वारियां और मुश्किलें बढ़ा देता है। चौमासा भींडर में बेटी के ससुराल में बिताना पड़ता है। लक्ष्मीबाई यह कहते हुए रुंआसी हो गई कि उसके घर में ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन आठ महीने में जो कुछ जुटता है, वह बारिश के दिनों में बर्बाद हो जाता है। क्योंकि तब घर में कोई नहीं होता। इतना पैसा भी नहीं है कि घर की छत डलवा दे। प्यारजी ने बताया कि वह सरकारी कार्यालयों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक के चक्कर काट चुके, लेकिन किसी ने उनकी पीड़ा पर ध्यान नहीं दिया।


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