इस गांव में माओवाद के फरमान सुन कांप गई सरकार, बस कागजों में ही हो रहा विकास

ajay shrivastav

Publish: Sep, 17 2017 03:02:28 PM (IST)

Dabba, Sukma, Chhattisgarh, India
इस गांव में माओवाद के फरमान सुन कांप गई सरकार, बस कागजों में ही हो रहा विकास

डब्बा में 6 आंगनबाड़ी संचालित हैं आज तक एक भी भवन नहीं बना है। भवन के अभाव में झोपड़ी में लग रहे हैं आंगनबाड़ी। वहीं 4 प्राथमिक स्कूलों का भवन नहीं है

सुकमा. जिले के ग्राम पंचायत डब्बा से सैकड़ों आदिवासी आज भी विकास से अनजान हैं। झोपड़ी में रहने वाले ग्रामीणों को शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली व सड़क की समस्या से जूझ रहे हैं। गांव में माओवाद के दस्तक के कारण सरकारी योजनाएं यहां नहीं पहुंची है। वहीं रोजगार का साधन नहीं होने से ग्रामीणों को काम करने 20 किमी दूर दंतेवाड़ा जिले के कटेकल्याण जाना पड़ता है। बताया जाता है कि माओवादियों के फरमान मानना ग्रामीणों की मजबूरी है। सुकमा-दंतेवाड़ा जिले के सरहद पर बसे इस गांव में हर वक्त माओवादियों की आमदरफ्त रहती है। गांव में कुल 4 पारा है। जिसकी जनसंख्या 1225 है। दिन में फोर्स व रात में माओवादियों की आवाजाही से लोग सहमे रहते हैं।

गांव को जोडऩे वाला डब्लूबीएम सड़क जर्जर
यहां 123 परिवारों के लिए शौचालय व 37 परिवारों के लिए आवास स्वीकृत है लेकिन माओवादियों के चलते कोई काम नहीं हो रहा है। इसके अलावा उज्जवला योजना के तहत किसी हितग्राही को गैस कनेक्शन भी नहीं मिला है। गांव को जोडऩे वाला डब्लूबीएम सड़क जर्जर हो चुकी है। वही गांव की कच्ची गालियां की वर्षों से सीसी सड़क का इंतजार कर रही हैं। ग्रामीण देवा भीमां ने बताया की हर साल सरपंच द्वारा बताया जा रहा हैं कि जल्द ही सीसी सड़क बनेगी लेकिन कई वर्षों से नही बन रही हैं।

छह आंगनबाड़ी और चार प्राथमिक शाला, एक का भी भवन नहीं
डब्बा में 6 आंगनबाड़ी संचालित हैं लेकिन आज तक एक भी भवन नहीं बना है। भवन के अभाव में झोपड़ी में लग रहे हैं आंगनबाड़ी। वहीं 4 प्राथमिक स्कूलों का भवन नहीं है। पेयजल के लिए लगे आठ बोरिंग में दो खराब है जबकि दो में आयरनयुक्त पानी आता है। खेतों की सिंचाई की सुविधा नहीं होने से ग्रामीण पारंपरिक खेती व वनोपज संग्रह करते हैं। वहीं माओवादियों की आवाजाही के कारण गांव से युवाओं का पलायन हो चुका है। यहां केवल बुजुर्ग ही बच गए हैं।

कागजों में उपस्वास्थ्य केंद्र
डब्बा में उपस्वास्थ्य केंद्र स्वीकृत हैं वो केवल कागजों में संचालित हैं। गांव में डॉक्टर व नर्स भी पदस्थ नही हैं। ऐसे में मरीजों को इलाज के लिए 40 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा जाना पड़ता है। वही गाँव में नेटवर्क नही होने से लोगो को 102 और 108 सेवा का लाभ नही मिल पा रहा हैं।

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