हर साल मिलती हैं २५ लावारिस बालिकाएं

Mukesh Sharma

Publish: Oct, 12 2017 10:16:22 (IST)

Surat, Gujarat, India
हर साल मिलती हैं २५ लावारिस बालिकाएं

सरकार भले बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा जोर-शोर से बुंलद कर रही हो, समाज में बेटियों से जुड़ी मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। आज भी पुत्री

सूरत।सरकार भले बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा जोर-शोर से बुंलद कर रही हो, समाज में बेटियों से जुड़ी मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। आज भी पुत्री का जन्म होने पर कई बेरहम माता-पिता उसे लावारिस छोड़ देते है। सूरत मेंहर साल ६ साल तक की २५ से अधिक बच्चियां लावारिस हालत में पाई जाती हैं।

शहर में नवजात शिशुओं को लावारिस छोड़ देने के मामले आए दिन सामने आते हैं। इन शिशुओं में ज्यादातर बालिकाएं होती हैं। कतारगाम के वी.आर.पोपावाला चिल्ड्रन होम (अनाथ आश्रम) के सूत्रों की मानें तो हर साल ०-६ साल के करीब ३५ बालक लावारिस पाए जाते हैं। इनमें से करीब २५ बालिकाएं होती हंै। इन्हें चिल्ड्रन होम के शिशु विभाग में रखा जाता है। इनके अभिभावकों का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। अभिभावकों का पता नहीं लगने पर ६० दिन बाद संबंधित थाने से एनओसी ली जाती है और केंद्रीय संस्था सी.ए.आर.ए. (सेंट्रल एडोप्शन रिसोर्स ऑथोरिटी) के जरिए उन्हें गोद दिया जाता है। फिलहाल शिशु विभाग में ८ बच्चें है, जिनमें छह बच्चियां शामिल हंै।

दो दर्जन भ्रूण मिलते हैं हर साल

सूरत में हर साल औसतन २०-२४ भ्रूण विभिन्न इलाकों से बरामद होते हैं। इन अवांछितों को अर्बोशन करवा कर या जन्म के बाद गुप्त रूप से छोड़ दिया जाता है। बहुत कम मामलों में कोई नवजात जिंदा बरामद होता है। इनमें ७० फीसदी से अधिक कन्या भ्रूण होते हैं। अनाथ आश्रम के सूत्रों का कहना है कि हर साल १००-१२५ लापता बच्चे मिलते हैं। इनमें आधे से अधिक रेलवे स्टेशन पर पाए जाते हैं। वह या तो अन्य शहरों से भटककर सूरत आ जाते हंै या सूरत से कहीं जा रहे होते हैं। परिजनों का पता लगने पर उन्हें परिवार को सौंप दिया जाता है। जिनके परिजनों का पता नहीं चल पाता, उन्हें आश्रम में रखा जाता है। फिलहाल ऐसे ६५ बच्चे आश्रम में हंै।

&सूरत में हर साल छह साल तक के ३०-३५ बच्चे मिलते हैं। इनमें २०-२५ बालिकाएं होती हैं। जयेन्द्र ठाकोर, जिला बाल सुरक्षा अधिकारी, सूरत

दिनेश एम.त्रिवेदी

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