एक और बड़ी भूल, ब्याज के चक्कर में गंवा दिया मूल

कांग्रेस ने ब्याज (पाटीदार) के चक्कर में नहीं पडक़र यदि मूल (आदिवासी) पर फोकस किया होता तो दक्षिण गुजरात में स्थिति बदल सकती थी। आदिवासी समाज परंपरागत

By: मुकेश शर्मा

Published: 04 Jan 2018, 09:50 PM IST

सूरत।कांग्रेस ने ब्याज (पाटीदार) के चक्कर में नहीं पडक़र यदि मूल (आदिवासी) पर फोकस किया होता तो दक्षिण गुजरात में स्थिति बदल सकती थी। आदिवासी समाज परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा है। पिछले कुछ समय से उनकी प्रतिबद्धताएं कांग्रेस से छिटकी हैं, लेकिन दूरी इतनी नहीं बढ़ी कि उनकी घर वापसी नहीं हो सके। सूरत समेत दक्षिण गुजरात में पाटीदार बहुल महज पांच सीटें हैं, जबकि आदिवासियों की १६ सीटें हैं। इनमें से इस बार कांग्रेस को आठ सीटें मिली हैं, लेकिन यह संख्या और ज्यादा हो सकती थी।

पाटीदारों से नजदीकी के कारण डॉ. तुषार चौधरी की सीट पर भी आदिवासी मतदाता खुद को पार्टी से नहीं जोड़ पाए। उधर, भाजपा ने पाटीदारों से बढ़ती दूरी के दूरगामी असर को भांपकर पार्टी नेताओं ने आदिवासी समाज के बीच घुसपैठ बनानी शुरू की।आलाकमान ने पार्टी के आदिवासी चेहरा गणपत वसावा को कमान सौंपी और सालभर के भीतर आदिवासी क्षेत्रों में विभिन्न आयोजन किए गए। पार्टी की कोशिश थी कि पाटीदारों के छिटकने से होने वाले नुकसान की भरपाई आदिवासी क्षेत्रों से कर ली जाए। इसका फायदा भी चुनावों में भाजपा को मिला है।

यह हैं आदिवासी बहुल सीटें

भरुच की झगडिय़ा और वागरा, नर्मदा जिले की डेडियापाडा और नांदोद, सूरत की मांडवी, बारडोली, महुआ, मांगरोल, तापी की निझर, व्यारा, वलसाड की कपराडा, उमरगांव और धरमपुर, नवसारी की गणदेवी, वांसदा और डांग आदिवासी बहुल सीटें हैं।


कारोबारियों ने वही समझा, जो उनके मतलब का था

सूरत. सौराष्ट्र में पटेल समाज खेती से जुड़ा है, जबकि सूरत का पाटीदार समाज कारोबार से जुड़ा है। यही वजह है कि पाटीदार आंदोलन का जो असर सौराष्ट्र में देखने को मिला, सूरत में नहीं दिखा। यहां कारोबारियों ने वही समझा, जो उनके कारोबारी हितों से जुड़ा था। भाजपा और कांग्रेस के बीच हार-जीत की यह बड़ी वजह रही। दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र में पाटीदार आंदोलन का असर अलग-अलग तरीके से देखने को मिला। सौराष्ट्र के पाटीदार सूरत में हीरा कारोबार से जुड़े हैं। वहां से जो लोग सूरत आए, हीरा उद्योग में नौकरी कर रहे हैं। हीरा कारोबारियों के हित पाटीदार आंदोलन से ज्यादा भाजपा सरकार से जुड़े हैं। उन्हें पता था कि भाजपा की सरकार बनने पर आर्थिक विकास की गति पर ब्रेक नहीं लगेगा।

निर्बाध आर्थिक विकास और सरकार की योजनाएं उनके कारोबारी हितों को साध रही हैं, इसीलिए जिन पाटीदारों ने सौराष्ट्र में भाजपा के खिलाफ वोट किया, उनके परिजनों ने सूरत में भाजपा का साथ दिया। सूरत में भाजपा को मिली जीत की यह बड़ी वजह रही।

अंतिम दिनों में जीता मन

भाजपा ने जीएसटी नियमों से नाराज व्यापारियों का मन अंतिम दिनों में जीत लिया। व्यापारी जीएसटी नियमों का विरोध कर रहे थे और उनमें भाजपा के प्रति नाराजगी थी। भाजपा के बड़े नेता और स्थानीय नेता इस बात को समझ गए थे, इसलिए अंतिम दिनों में जीएसटी काउंसिल की मीटिंग में नियमों में सरलीकरण किया गया और कई नियमों में सरलीकरण का आश्वासन दिया गया। इसके बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली सूरत आए और व्यापारियों से मिले। उन्होंने व्यापारियों को ई-वे बिल की समस्या मार्च अंत तक समाप्त करने का आश्वासन दिया। राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने भी कपड़ा बाजार का दौरा किया।

मुकेश शर्मा Reporting
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